Skip to main content

Posts

चार्वाक दर्शन एक परिचय An Introduction to Charvaka Philosophy

चार्वाकदर्शन - लोकायतदर्शन चार्वाक दर्शन एक परिचय An Introduction to Charvaka Philosophy इस मत का प्रवर्तक बृहस्पति हुआ है । बृहस्पति का विश्वास था , कि जो कुछ है , यही लोक है , इसलिये इसी की चिन्ता करनी चाहिये , और इसी को सुखदायी बनाना चाहिये , परलोक के लिये व्यर्थ व्यय और व्यर्थ परिश्रम नहीं उठाना चाहिये । इस विश्वास को लेकर उसने अर्थ और काम को ही पुरुषार्थ मानकर धर्म और मोक्ष के विषयों का खण्डन किया है । प्रमाण निर्णय प्रत्यक्ष ही एक प्रमाण है , क्योंकि यथार्थज्ञान के साधन केवल इन्द्रिय ही हैं । इन्द्रिय पांच बाहर हैं , और एक अन्दर । नेत्र , श्रोत्र , घ्राण , रसना और त्वचा बाह्य इन्द्रिय हैं , और मन अन्तरिन्द्रिय है । बाह्य इन्द्रियों से बाहर का अनुभव होता है , और अन्तरिन्द्रिय से अन्दर का । नेत्र से रूप , श्रोत्र से शब्द , घ्राण से गन्ध , रसना से रस और त्वचा से स्पर्श का अनुभव होता है और मन से सुख दुःख का वा इच्छा, द्वेष, प्रयत्न और ज्ञान का । बस इतना ही अनुभव है , यहां तक ही हमारे इन्द्रियों का साक्षात् सम्बन्ध है , इसी को प्रत्यक्ष कहते हैं , यही प्रमाण है । जिस ज्ञान में इन दोनो...

ब्रह्म, आत्मा और जगत, उपनिषदों के केंद्रीय सिद्धांतों का एक संक्षिप्त परिचय

उपनिषदों का परिचय Introduction to Upanishads उपनिषद दार्शनिक विचारों का प्राचीनतम संग्रह है, जिनमें शुद्धतम ज्ञानपक्ष पर बल दिया गया है। उपनिषदों को भारतीय दर्शन का स्रोत कहा जाता है। उपनिषदों की कुल संख्या 108 मानी गई है, किन्तु आचार्य शंकर ने केवल 10 उपनिषदों पर ही अपने भाष्य लिखे है, जो कि वर्तमान में लोकप्रिय है। निम्नलिखित श्लोक में दस उपनिषद बताएं गए है -  "ईश-केन-कठ-प्रश्न-मुंड-माण्डुक्य-तित्तिरिः  ऐतरेयञ्च छान्दोग्यं वृहदारण्यकन्तथा" ।।  अर्थात दस उपनिषद ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, माण्डुक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और वृहदारण्यक है। इस सूची में कौशितकी, मैत्री और श्वेताश्वेतर नाम जोड़ देने पर मुख्य उपनिषदों की संख्या तेरह हो जाती है। उपनिषद वैदिक साहित्य का अन्तिम भाग है, इसलिए इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। इन्हें आरण्यक भी कहा जाता है क्योंकि इनका मनन अरण्य अर्थात वन के एकांत वातावरण में होता था। आरण्यक का मुख्य विषय आध्यात्मिक तत्व की प्राप्ति है। उपनिषदों में आत्मज्ञान, मोक्षज्ञान और ब्रह्मज्ञान की प्रधानता होने के कारण इन्हें आत्मविद्या, मोक्षविद्या ...