स्वामी विवेकानन्द के अनुसार , धर्मों का बाहरी अनुष्ठान आध्यात्मिक महत्त्व का होता है। धर्मों के आध्यात्मिक सार को स्वीकार करने की आवश्यकता है। हम मानव जाति को ऐसे स्थान पर ले जाना चाहते हैं , जहाँ न तो वेद , न ही बाइबिल और न ही कुरान है। यह वेदों , बाइबिल एवं कुरान के सामंजस्य से किया जा सकता है। मानव जाति को यह शिक्षा देनी चाहिए कि धर्म विभिन्न प्रकार के विचारों की अभिव्यक्ति है , जिसकी समष्टि में प्रत्येक मानव अपने पथ का चुनाव कर सकता है , जो उसके लिए सबसे उपयुक्त हो। कई दृष्टिकोण से सत्य को देखा जा सकता है और विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। इस आधारभूत सत्य को स्वीकार करना चाहिए। मनुष्य की निःस्वार्थ सेवा सर्वव्यापी रूप में प्रदर्शित होती है। इसके लिए आत्मनियन्त्रण वांछनीय है। मोक्ष सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है , जो स्वयं उसमें समाहित है। -----------------