स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, धर्मों का बाहरी
अनुष्ठान आध्यात्मिक महत्त्व का होता है। धर्मों के आध्यात्मिक सार को स्वीकार
करने की आवश्यकता है। हम मानव जाति को ऐसे स्थान पर ले जाना चाहते हैं, जहाँ न तो वेद, न ही बाइबिल और न ही कुरान है। यह
वेदों, बाइबिल एवं कुरान के सामंजस्य से किया जा सकता है।
मानव जाति को यह शिक्षा देनी चाहिए कि धर्म विभिन्न प्रकार के विचारों की
अभिव्यक्ति है, जिसकी समष्टि में प्रत्येक मानव अपने पथ का
चुनाव कर सकता है, जो उसके लिए सबसे उपयुक्त हो। कई
दृष्टिकोण से सत्य को देखा जा सकता है और विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता
है। इस आधारभूत सत्य को स्वीकार करना चाहिए। मनुष्य की निःस्वार्थ सेवा सर्वव्यापी
रूप में प्रदर्शित होती है। इसके लिए आत्मनियन्त्रण वांछनीय है। मोक्ष सम्पूर्ण
सृष्टि में व्याप्त है, जो स्वयं उसमें समाहित है।
न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice प्रमाण विचार न्याय दर्शन में 16 पदार्थों के तत्त्वज्ञान द्वारा मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है । 'प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्क निर्णयवादजल्पवितंडाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसाधिगमः। (न्यायसूत्र, 1.1.1) अर्थात प्रमाणादि षोडश पदार्थों के तत्त्वज्ञान से अपवर्ग (मोक्ष) की प्राप्ति होती है। प्रायः सभी भारतीय दर्शन तत्त्व विचार करने के पूर्व तत्त्व को जानने के साधन पर विचार करते हैं। ये साधन ही प्रमाण कहे जाते हैं। प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) की प्राप्ति के साधन को प्रमाण कहते हैं 'प्रमीयते अनेन इति प्रमाणम्, तथा 'प्रमाकरणं प्रमाणम्’। प्रमाण के चार प्रकार हैं - 1. प्रत्यक्ष प्रमाण महर्षि गौतम ने न्यायसूत्र में कहा है – इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्। अव्यपदेशमव्यभिचारिव्यवसायात्मक प्रत्यक्षम् ।। (न्यायसूत्र) ...

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