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न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice

न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice

न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice

प्रमाण विचार न्याय दर्शन में 16 पदार्थों के तत्त्वज्ञान द्वारा मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है । 

'प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्क निर्णयवादजल्पवितंडाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसाधिगमः। (न्यायसूत्र, 1.1.1) 

अर्थात प्रमाणादि षोडश पदार्थों के तत्त्वज्ञान से अपवर्ग (मोक्ष) की प्राप्ति होती है। 

       प्रायः सभी भारतीय दर्शन तत्त्व विचार करने के पूर्व तत्त्व को जानने के साधन पर विचार करते हैं। ये साधन ही प्रमाण कहे जाते हैं। प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) की प्राप्ति के साधन को प्रमाण कहते हैं 'प्रमीयते अनेन इति प्रमाणम्, तथा 'प्रमाकरणं प्रमाणम्’। प्रमाण के चार प्रकार हैं - 

1. प्रत्यक्ष प्रमाण 

महर्षि गौतम ने न्यायसूत्र में कहा है – 

इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्। 

अव्यपदेशमव्यभिचारिव्यवसायात्मक प्रत्यक्षम् ।। (न्यायसूत्र)

        इसका अभिप्राय इन्द्रिय और अर्थ (वस्तु) के सन्निकर्ष (समीपता) से उत्पन्न ऐसा ज्ञान, जो भाषा पर आधारित न हो, जो भ्रामक न हो तथा जो अनिश्चित न हो, वह प्रत्यक्ष ज्ञान है। प्रत्यक्ष के दो भेद हैं - लौकिक प्रत्यक्ष तथा अलौकिक प्रत्यक्ष। इन्द्रियों का वस्तु से सम्पर्क होने पर जिस ज्ञान की उपलब्धि होती है उसे लौकिक प्रत्यक्ष कहते है। यह दो प्रकार का होता है – बाह्य प्रत्यक्ष और मानस प्रत्यक्ष। पाँच ज्ञानेन्द्रियों से मिलने वाला ज्ञान बाह्य प्रत्यक्ष होता है जो कि पाँच प्रकार का है – चाक्षुष प्रत्यक्ष, श्रौत प्रत्यक्ष, घ्राण प्रत्यक्ष, स्पर्शज प्रत्यक्ष और रासज प्रत्यक्ष। मन के द्वारा सुख-दुःख आदि का ज्ञान मानस प्रत्यक्ष कहलाता है। 

        एक अन्य दृष्टि से लौकिक प्रत्यक्ष के तीन भेद है – निर्विकल्पक प्रत्यक्ष, सविकल्पक प्रत्यक्ष और प्रत्यभिज्ञा। निर्विकल्पक प्रत्यक्ष में केवल यह ज्ञान होता है कि कोई अमुक वस्तु है। सविकल्पक प्रत्यक्ष में वस्तु के ज्ञान में इन्द्रिय ज्ञान निहित हो जाता है और हम वस्तु की सही-सही जानकारी ले लेते है। प्रत्यभिज्ञा ज्ञान में वस्तु से जुड़े सभी पूर्व संस्कार भी समाहित हो जाते है। 

       अलौकिक प्रत्यक्ष के अन्तर्गत उस ज्ञान की उपलब्धि होती है जो बिना इन्द्रियों के सन्निकर्ष से प्राप्त होता है। इसके भी तीन भेद होते है – समान्य लक्षणा प्रत्यक्ष, ज्ञान लक्षणा प्रत्यक्ष और योगज प्रत्यक्ष। सामान्य ज्ञान की उपलब्धि सामान्य लक्षणा प्रत्यक्ष के कारण होती है। जैसे – मनुष्य को देखकर मनुष्य जाति का ज्ञान या मनुष्यत्व का ज्ञान। जब किसी एक ज्ञानेन्द्रिय प्रत्यक्ष से दूसरी ज्ञानेन्द्रिय का भी ज्ञान हो जाता है तो इसे ज्ञान लक्षणा प्रत्यक्ष कहते है। जैसे हरी-हरी घास को देख कर उसकी कोमलता का ज्ञान भी हो जाना। योग सिद्धि के द्वारा योगियों को होने वाला ज्ञान योगज प्रत्यक्ष कहलाता है। 

2. अनुमान प्रमाण 

       अनुमान दो शब्दों से बना है - अनु तथा मान। अनु का अर्थ पश्चात् तथा मान का अर्थ है ज्ञान, इसका तात्पर्य हुआ- पूर्वज्ञान के पश्चात् होने वाला ज्ञान ‘अनुमान' है। न्यायदर्शन में सामान्यतः अनुमिति के करण को अनुमान प्रमाण कहा जाता है। अनुमान प्रमाण के दो भेद किये गये हैं - स्वार्थानुमान एवं परार्थानुमान। स्वार्थानुमान का प्रयोग व्यक्ति स्वयं के लिए करता है। जब किसी अन्य व्यक्ति को समझाने के लिए अनुमान प्रमाण का प्रयोग किया जाता है, तब उसे परार्थानुमान कहते हैं । यथा- पर्वत में अग्नि है (प्रतिज्ञा), क्योंकि वहाँ धुआँ है (हेतु), जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ अग्नि है, जैसे- रसोईघर में (उदाहरण), पर्वत में धुआँ है (उपनय), इसलिए पर्वत में अग्नि है (निगमन)। इस प्रकार से पाँच वाक्यों द्वारा अनुमान की प्रक्रिया पूर्ण होती है। 

अनुमान के भेद – अनुमान के तीन आधार पर भेद किए गए है –

  1. पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट – यह भेद प्राचीन न्याय के अनुसार है। 
  2. केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वयव्यतिरेकी – यह भेद नव्य-न्याय के अनुसार है। 
  3. स्वार्थानुमान और परार्थानुमान – यह भेद मनोवैज्ञानिक दृष्टि के अनुसार है। 

स्वार्थानुमान – जब अनुमान की प्रक्रिया स्वयं के ज्ञान के लिए पूर्ण की जाती है तो इस विधि स्वार्थानुमान कहते है। इस अनुमान में तीन वाक्यों अर्थात अवयवों का प्रयोग किया जाता है–

  • प्रतिज्ञा – पर्वत पर आग है। 
  • चन्ह या हेतु – क्योंकि पर्वत पर धुआँ है। 
  • उदाहरण – जहाँ-जहाँ धुआँ होता है, वहाँ-वहाँ आग होती है। 

परार्थानुमान – जब दूसरों को समझाने के लिए अनुमान प्रमाण का प्रयोग किया जाता है तो इसे परार्थानुमान कहते है। इसमें पंचावयवों का प्रयोग किया जाता है – 

  • प्रतिज्ञा – पर्वत पर आग है। 
  • चिन्ह या हेतु – क्योंकि पर्वत पर धुआँ है। 
  • उदाहरण – जहाँ-जहाँ धुआँ होता है, वहाँ-वहाँ आग होती है।
  • उपनयन – पर्वत में धुआँ है। 
  • निगमन – इसलिए पर्वत में आग है। 

पूर्ववत् अनुमान – कारण को देखकर कार्य का अनुमान पूर्ववत् अनुमान होता है। जैसे – काले बादलों को देखकर वर्षा का ज्ञान होना। 

शेषवत् अनुमान – कार्य को देखकर कारण का अनुमान शेषवत् अनुमान है। जैसे – सड़क को गीली देखकर वर्षा का ज्ञान। 

सामान्यतोदृष्ट अनुमान – सामान्य को देखकर विशेष का ज्ञान सामान्यतोदृष्ट अनुमान है। जैसे – सिंग वाले पशु को देखकर पुंछ का ज्ञान। 

केवलान्वयी अनुमान – जब केवल भावात्मक उदाहरणों के आधार पर व्याप्ति की स्थापना होती है। अभावात्मक उदाहरण मिलते है नहीं, तो उसे केवलान्वयी अनुमान कहते है। जैसे- "जिन्हें नाम दिया जा सकता है, उनका ज्ञान सम्भव है।" इस सामान्य वाक्य के आधार पर हम निम्नलिखित अनुमान उपस्थित कर सकते हैं –

सभी ज्ञेय पदार्थ नामधारी (अभिधेय) है। 

घट नामधारी हैं। 

अतः घट ज्ञेय है। 

     इसे हमने केवलान्वयी अनुमान इसलिए कहा क्योंकि ऐसी व्याप्ति में अभावात्मक उदाहरण नहीं मिलते जैसे कि हम यहाँ पर यह नहीं कह सकते कि जो नामधारी (अभिधेय) नहीं है वह अज्ञेय है क्योंकि हम ऐसी कोई भी वस्तु नहीं बता सकते जिसका नाम न रखा जा सकता हो। 

केवलव्यतिरेकी - कभी-कभी व्यापित स्थापना के लिए केवल भावात्मक उदाहरण मिलते हैं, अभावात्मक नहीं, जैसे- “यह पर्वत हिमालय है, क्योंकि यह सबसे ऊँचा है।" उक्त अनुमान की पुष्टि के लिए हमें कोई भावात्मक उदाहरण नहीं मिलते, क्योंकि हम यह नहीं कह सकते कि 'क' सबसे ऊँचा है, अतः वह हिमालय है अथवा 'ग' सबसे ऊँचा है, अतः वह हिमालय है, तो यहाँ केवल अभावात्मक उदाहरण देते हुए कह सकते हैं । "जो हिमालय नहीं है वह सबसे ऊँचा नहीं है, जैसे सिहावा पर्वत।" इस प्रकार केवल अभावात्मक उदाहरण द्वारा पुष्टि होने के कारण यह अनुमान केवलव्यतिरेकी अनुमान हुआ। 

अन्वयव्यतिरेकी - जहाँ भावात्मक और अभावात्मक दोनों प्रकार के उदाहरण दिये जा सकते हों, उसे अन्वयव्यतिरेकी अनुमान कहते हैं। जैसे - "पर्वत में आग है, क्योंकि वहाँ धुआँ है" इस उदाहरण के व्यापित सम्बन्ध (जहाँ-जहाँ धुआँ होता है वहाँ-वहाँ आग होती है) को हम भावात्मक एवं अभावात्मक दोनों प्रकार के उदाहरण द्वारा पुष्ट कर सकते हैं, जैसे- इसका भावात्मक उदाहरण है- 'रसोईघर, गौशाला आदि (क्योंकि यहाँ धुएँ के संग बराबर आग रहती है) तथा इसका अभावात्मक उदाहरण हैं 'कमरा' जहाँ आग नहीं तो धुआँ भी नहीं है। इस तरह दोनों प्रकार के उदाहरण दिये जा सकने वाला अनुमान अन्वव्यतिरेकी अनुमान हुआ। 

3. उपमान प्रमाण 

        सादृश्यता के आधार पर प्राप्त ज्ञान ही उपमान कहलाता है। न्याय सूत्र के अनुसार- “प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्” अर्थात् प्रसिद्ध पदार्थों के समान धर्म से साध्य के साधन को उपमान कहा जाता है। 

4. शब्द प्रमाण 

        गौतम के अनुसार “आप्तोपदेशः शब्दः” कहा गया है अर्थात् आप्त का उपदेश (कथन) ही शब्द प्रमाण है। इनके अनुसार शब्द तभी प्रमाण बन्ते हैं जब यथार्थ, वास्तविक एवं विश्वास के योग्य हों। ऐसे वचनों को व्यक्त करने वाला आप्त कहा गया है। 

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