भारतीय दर्शन Home Page Syllabus Question Bank Test Series About the Writer योग दर्शन में चित्त की अवधारणा योग दर्शन में चित्त की अवधारणा योग दर्शन का प्रतिपादन पतंजलि ने किया तथा अपने ' योगसूत्र ' के दूसरे सूत्र में कहा कि ' योगाश्चित्तवृत्ति निरोधः ' अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। अत : योग को ठीक प्रकार से समझने के लिए चित्त तथा चित्तवृत्ति क्या है ? तथा इन चित्तवृत्तियों का निरोध कैसे होता है ? यह जानना आवश्यक है। चित्त योग दर्शन में चित्त का अर्थ ' अन्त : करण ' माना गया है। योग मतानुसार चित्त के अन्तर्गत महत् ( बुद्धि ), अहंकार तथा मन तीनों ही आ जाते हैं अर्थात् बुद्धि , अहंकार तथा मन को ही संयुक्त रूप से चित्त की संज्ञा दी गई है। चित्त की विशेषताएँ योग दर्शन में चित्त की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई गई हैं - ● त्रिगुणात्मक प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण चित्त को भी त्रिगुणात्मक माना गया है , परन्तु इसमें सत् गुण की प्रधानता होती है। ●...