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चार्वाक दर्शन एक परिचय An Introduction to Charvaka Philosophy

चार्वाकदर्शन - लोकायतदर्शन चार्वाक दर्शन एक परिचय An Introduction to Charvaka Philosophy इस मत का प्रवर्तक बृहस्पति हुआ है । बृहस्पति का विश्वास था , कि जो कुछ है , यही लोक है , इसलिये इसी की चिन्ता करनी चाहिये , और इसी को सुखदायी बनाना चाहिये , परलोक के लिये व्यर्थ व्यय और व्यर्थ परिश्रम नहीं उठाना चाहिये । इस विश्वास को लेकर उसने अर्थ और काम को ही पुरुषार्थ मानकर धर्म और मोक्ष के विषयों का खण्डन किया है । प्रमाण निर्णय प्रत्यक्ष ही एक प्रमाण है , क्योंकि यथार्थज्ञान के साधन केवल इन्द्रिय ही हैं । इन्द्रिय पांच बाहर हैं , और एक अन्दर । नेत्र , श्रोत्र , घ्राण , रसना और त्वचा बाह्य इन्द्रिय हैं , और मन अन्तरिन्द्रिय है । बाह्य इन्द्रियों से बाहर का अनुभव होता है , और अन्तरिन्द्रिय से अन्दर का । नेत्र से रूप , श्रोत्र से शब्द , घ्राण से गन्ध , रसना से रस और त्वचा से स्पर्श का अनुभव होता है और मन से सुख दुःख का वा इच्छा, द्वेष, प्रयत्न और ज्ञान का । बस इतना ही अनुभव है , यहां तक ही हमारे इन्द्रियों का साक्षात् सम्बन्ध है , इसी को प्रत्यक्ष कहते हैं , यही प्रमाण है । जिस ज्ञान में इन दोनो...

विश्व के लोगों को चार्वाक दर्शन का ज्ञान क्यों जरूरी है ?

विश्व के लोगों को चार्वाक दर्शन का ज्ञान क्यों जरूरी है ? चार्वाक दर्शन की एक बहुत प्रसिद्ध लोकोक्ति है – “यावज्जजीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमन् कुतः॥” अर्थात् जब तक जियो सुख से जियो ऋण लेकर भी घी पियो। एक बार शरीर भस्म हो जाए तो फिर कौन लौटकर आता है। आज प्रत्येक युवा पीढ़ी इसी दर्शन को फॉलो कर रही है। उन्हें सुखवाद को लेकर एक अजीब सा जनून पैदा हो गया है। हर कोई यह चाहता है कि मुझे बस सुख मिल जाए चाहे उसके लिए वह कितना भी आध्यात्मिक पतन क्यों न कर ले। वह अपने सुख की कामना केवल आर्थिक संसासधनों में खोजने लगा है और अपनी आर्थिक उन्नति के लिए समाज के नैतिक मूल्यों को बेशर्मी के साथ सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर परोस रहा है। नित रोज नैतिक मूल्यों का जो अवमूल्यन इन सोशल प्लेटफॉर्म्स पर हो रहा है उसके पीछे केवल और केवल सुख की चाहा है। इस सुख की चाहा चार्वाक दर्शन भी करता है इसलिए तो चार्वाक दर्शन को सुखवादी दर्शन कहते है। परन्तु नैतिक अवमूल्यन की जो पराकाष्ठा आज देखने को मिल रही है इतनी तो शायद चार्वाक सम्प्रदायों में भी नहीं थी। वे भी अपना एक प्रकार का दर्शन रख...

चार्वाक दर्शन में चेतना का स्वरूप

  चार्वाक दर्शन में चेतना का स्वरूप चार्वाक दर्शन में चेतना का स्वरूप चार्वाक दर्शन में चेतना का स्वरूप     चार्वाक जगत के मूल में चार द्रव्य – पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु को स्थित मानता है। आकाश को वह शून्य मात्र समझत है क्योंकि इसका प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता। जगत के ये चार द्रव्य की संयुक्त होकर जगत की रचना करते है। चरों द्रव्य के संयुक्त होने के पीछे चार्वाक किसी ईश्वर की कल्पना नहीं करता बल्कि वह कहता है कि संयुक्त होना इन चार द्रव्यों का स्वभाव है। इसी को चार्वाक का स्वभाववाद कहते है। क्योंकि जगत निर्माण में चार जड़ पदार्थ उपस्थित होते है इसलिए इस सिद्धान्त को जड़वाद भी कहा जाता है। चार्वाक इन्ही जड़ से चेतन की उत्पत्ति समझते है। उनके अनुसार – जड़भूतविकारेषु चैतन्यं यत्तु दृश्यते । ताम्बूलपुंग चूर्णानां योगात्राग इवोत्थितम् ॥     अर्थात जड़-भूतों से चैतन्य उसी प्रकार उत्पन्न होता है जिस प्रकार पान-पत्र, सुपारी, चुने और कत्थे के संयोग से लाल रंग उत्पन्न होता है। एक और उद्धरण प्रस्तुत करते हुए चार्वाक कहते है कि “किण्वादिभ्यो मदशक्तिवद् चैतन्यमुपजायते” अर्थात जस प...

चार्वाक द्वारा अनुमान एवं शब्द की समीक्षा

  चार्वाक द्वारा अनुमान एवं शब्द की समीक्षा चार्वाक द्वारा अनुमान एवं शब्द की समीक्षा चार्वाक द्वारा अनुमान एवं शब्द की समीक्षा     चार्वाक दर्शन में अनुमान और शब्द प्रमाण की आलोचना की गई है। इसका कारण व्याप्ति के आधार पर यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति नहीं होना है। जब हम धुआँ देखकर आग का अनुमान करते है तो धुएं के साथ आग का ज्ञान हो जाना व्याप्ति सम्बन्ध कहलाता है। चार्वाकों के अनुसार यह व्याप्ति सम्बन्ध से प्राप्त ज्ञान कभी भी सन्देह से परे नहीं होता। चार्वाक दर्शन में इसी व्याप्ति सम्बन्ध को आलोचना निम्नलिखित तर्कों से की गई है- चार्वाक कहते है कि हम कभी भी व्याप्ति सम्बन्ध का प्रत्यक्ष नहीं कर सकते। धुएं और आग में सर्वत्र ही व्याप्ति सम्बन्ध है यह हम सर्वत्र बिना देखे नहीं कह सकते। इसके साथ-साथ व्याप्ति सम्बन्ध सर्वकाल में भी सिद्ध नहीं किया जा सकता। भूत और भविष्य के धुएं और आग के मध्य व्याप्ति सम्बन्ध को हम वर्तमान काल में सिद्ध नहीं कर सकते। अनुमान प्रमाण की सिद्धि के दो मुख्य आधार है – पहला वस्तुओं का स्वभाव समान होता है और दूसरा जगत में कार्य-कारण सम्बन्ध होता है। चार्वा...

चार्वाक का प्रत्यक्ष प्रमाण

  चार्वाक का प्रत्यक्ष प्रमाण चार्वाक का प्रत्यक्ष प्रमाण चार्वाक का प्रत्यक्ष प्रमाण     चार्वाक दर्शन में केवल प्रत्यक्ष को हि ज्ञान का साधन माना गया है। चार्वाक केवल उसको प्रत्यक्ष समझते है जिनको आँखों के द्वारा देखा जा सके या जिसको इंद्रियों के द्वारा अनुभूत किया जा सके। इस कारण चार्वाक उसी को ज्ञान अर्थात सत्य मानता है जो इंद्रियाँ देती है। चार्वाक पाँच इंद्रियों के साथ-साथ मन को भी प्रत्यक्ष ज्ञान देने वाला बताते है, क्योंकि सुख-दुःख आदि की स्पष्ट अनुभूति होती है। इस प्रकार चार्वाक दर्शन में दो प्रकार के प्रत्यक्ष स्वीकार्य है – बाह्य प्रत्यक्ष और मनस प्रत्यक्ष। -----------

चार्वाक दर्शन (Charvaka Philosophy) एवं इसका साहित्य

चार्वाक दर्शन (Charvaka Philosophy)  चार्वाक दर्शन (Charvaka Philosophy) चार्वाक दर्शन यावजीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ?     बृहस्पति के मत को मानने वाले , नास्तिकों के शिरोमणि (प्रधान) चार्वाक के मत का खण्डन करना कठिन है , क्योंकि   प्रायः संसार में सभी प्राणी इसी लोकोक्ति पर चलते हैं - ' जबतक जीवन रहे सुख से जीना चाहिए , ऐसा कोई नहीं जिसके पास मृत्यु न जा सके , जब शरीर एक बार जल जाता है तब इसका पुनः आगमन कैसे हो सकता है ? सभी लोग नीतिशास्त्र और कामशास्त्र के अनुसार अर्थ (धन-संग्रह) और काम (भोग-विलास) को ही पुरुषार्थ समझते हैं , परलोक की बात को स्वीकार नहीं करते हैं तथा चार्वाक-मत का अनुसरण करते हैं। इस तरह मालूम होता है [बिना उपदेश के ही लोग स्वभावतः सर्वदर्शनसंग्रहे चार्वाक की ओर चल पड़ते हैं] इसलिए चार्वाक-मत का दूसरा नाम अर्थ के अनुकूल ही है-लोकायत (लोक = संसार में , आयत = व्याप्त , फैला हुआ)। विशेष - शङ्कर , भास्कर तथा अन्य टीकाकार लोकायतिक नाम देते हैं। लोकायतिक-मत चार्वाकों का कोई सम्प्रदाय है। चार्वाक = चार...

चार्वाक दर्शन का महत्त्व

भारतीय दर्शन Home Page Syllabus Question Bank Test Series About the Writer चार्वाक दर्शन का महत्त्व चार्वाक दर्शन का महत्त्व चार्वाक ने समाज को रूढ़िवादिता और अन्धविश्वासी होने से बचाया , भौतिकवाद की नींव रखी तथा भारतीय दर्शन को बहु - आयामी स्वरूप प्रदान किया , इसलिए चार्वाक दर्शन का अत्यधिक महत्त्व है। ---------------