भारतीय दर्शन Home Page Syllabus Question Bank Test Series About the Writer मीमांसा दर्शन में उपमान प्रमाण की अवधारणा मीमांसा दर्शन में उपमान प्रमाण की अवधारणा उपमान प्रमाण मीमांसकों का उपमान प्रमाण नैयायिकों से थोड़ा भिन्न है। न्याय दर्शन में उपमान प्रमाण के अन्तर्गत समानता का प्रत्यक्ष करके नाम एवं नामी के बीच सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त किया जाता है , किन्तु मीमांसकों का मत है कि उपमान प्रमाण के अन्तर्गत हमें यह ज्ञात होता है कि स्मृत वस्तु प्रत्यक्ष वस्तु की तरह है। यहाँ प्रत्यक्ष वस्तु के बारे में किसी प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा कोई पूर्व सूचना किसी ज्ञाता को नहीं दी जाती है। ज्ञाता अपनी स्मृति के आधार पर स्मृत वस्तु एवं प्रत्यक्ष वस्तु के बीच समानता का ज्ञान प्राप्त करता है ; जैसे — माना ज्ञाता को गाय का पूर्व ज्ञान है , जब वह वन में गया तो उसने गाय से सादृश्य ( समानता ) रखता हुआ एक पशु देखा तो उसे देखते ही उसने अपनी स्मृति के आधार पर यह ज्ञान प्राप्त कर लिया कि अरे गाय तो बिल्कुल उस पशु की त...