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चार्वाक दर्शन में आत्मा का स्वरूप

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चार्वाक दर्शन में आत्मा का स्वरूप

चार्वाक दर्शन में आत्मा का स्वरूप

     चार्वाक शरीर से पृथक् भिन्न, नित्य, स्वतन्त्र अमर आत्मा के अस्तित्व का खण्डन करते हैं, क्योंकि उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है। उल्लेखनीय है कि चार्वाक दर्शन में आत्मा का निषेध नहीं हुआ है, बल्कि आत्मा के अभौतिक स्वरूप एवं उसके दिव्य गुणों का ही निषेध किया गया है। चार्वाक एवं बौद्ध दर्शन के अतिरिक्त अन्यान्य भारतीय दर्शनों में चेतना को नित्य आत्मा का स्वरूप धर्म या आगन्तुक धर्म माना गया है, परन्तु चार्वाक के अनुसार प्रत्यक्ष से आत्मा नामक किसी अभौतिक तत्त्व का ज्ञान नहीं होता, जिसका स्वरूप चेतन हो।

    चार्वाक दर्शन के अनुसार, चेतना शरीर का गुण है। चार्वाक चेतना को शरीर के आगन्तुक गुण के रूप में स्वीकार करते हैं, क्योंकि इनकी मान्यता है कि जब चार प्रकार के जड़ तत्त्व-पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु एक निश्चित मात्रा में तथा निश्चित अनुपात में परस्पर संयुक्त हो जाते हैं, तो चेतना उत्पन्न हो जाती है। अपनी इस बात को समझाने के लिए चार्वाक ने एक दृष्टान्त समझाया है। चार्वाक कहता है कि जिस प्रकार पान, सुपारी, चूना आदि को मिलाकर जब चबाया जाता है, तो लालिमा का गुण उत्पन्न हो जाता है, ठीक उसी प्रकार चार प्रकार के जड़ तत्त्वों के एक निश्चित मात्रा में संयुक्त होने से चेतना का गुण उत्पन्न हो जाता है।

     चार्वाक का विचार है कि जब तक शरीर में इन चार प्रकार के जड़ तत्त्वों की निश्चित मात्रा तथा निश्चित अनुपात बना रहता है, तब तक शरीर में चेतना का गुण रहता है अर्थात् जीवन बना रहता है, परन्तु जैसे ही यह निश्चित मात्रा तथा अनुपात नहीं रहता, तो शरीर अचेतन हो जाता है अर्थात् शरीर की मृत्यु हो जाती है। इसलिए चार्वाक कहता है कि इस चेतन शरीर के अतिरिक्त नित्य आत्मा जैसी कोई चीज नहीं है। चैतन्य विशिष्ट देहः इव आत्माः अर्थात् चेतना से युक्त शरीर ही आत्मा है, इसलिए चार्वाक के आत्मा सम्बन्धी मत को देहात्मवाद भी कहते हैं।

     चार्वाक का मत है कि जब तक यह शरीर रहता है, तब तक तथाकथित आत्मा रहती है, जब यह चेतन शरीर नष्ट हो जाता है, तो आत्मा भी नष्ट हो जाती है, क्योंकि यह चेतन शरीर ही तो आत्मा है। चूंकि शरीर के विनाश के साथ ही आत्मा का भी विनाश हो जाता है, इसलिए पुनर्जन्म, कर्म, नियम इत्यादि की अवधारणाएँ निराधार हो जाती हैं। 

चार्वाक के आत्मा सम्बन्धी मत की आलोचना

    चार्वाक के आत्मा सम्बन्धी मत के विरुद्ध आलोचक कहते हैं कि चेतना शरीर का आगन्तुक लक्षण नहीं है, बल्कि यह स्वतन्त्र एवं नित्य है। जड़ तत्त्वों से चेतना की उत्पत्ति को स्वीकार करना अभाव से भाव की उत्पत्ति को मानना है। तात्पर्य यह है कि जड़ तत्त्व से चेतना की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि दोनों में गुणात्मक भेद हैं।

     यदि चेतना जीवित शरीर का गुण है, तो उसे हमेशा शरीर के साथ ही रहना चाहिए, परन्तु हमें ज्ञात है कि मूर्छा, बेहोशी आदि की स्थिति में शरीर अचेतन हो जाता है, इसी प्रकार स्वप्नावस्था में चेतना तो होती है, परन्तु शरीर का भान नहीं रहता। इससे सिद्ध होता है कि चेतना व शरीर दो भिन्न-भिन्न चीजें हैं।

     जड़ तत्त्वों से इस जड़ जगत की उत्पत्ति निमित्त कारण के बिना सम्भव नहीं है। अतः हम स्वभाववाद को स्वीकार नहीं करते। चार्वाक अपने आत्म-विचार में प्रत्यक्ष की सीमा का अतिक्रमण करते हैं, क्योंकि प्रत्यक्ष नहीं होने के कारण वह नित्य आत्मा के नहीं होने का अनुमान कर लेते हैं, यह चार्वाक की ज्ञानमीमांसा के विपरीत है।

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