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चार्वाकों के द्वारा धर्म तथा मोक्ष के स्वरूप का निराकरण

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चार्वाकों के द्वारा धर्म तथा मोक्ष के स्वरूप का निराकरण

चार्वाक के द्वारा धर्म तथा मोक्ष का निराकरण

    चार्वाक मोक्ष को स्वीकार नहीं करता। मोक्ष का अर्थ दुःख विनाश है। आत्मा ही मोक्ष को अपनाती है। चूंकि चार्वाक आत्मा जैसी किसी सत्ता को स्वीकार नहीं करता, अत: चार्वाक मोक्ष को भी स्वीकार नहीं करता। कुछ दार्शनिकों की मान्यता है कि मोक्ष की प्राप्ति जीवनकाल में ही सम्भव है। चार्वाक कहता है कि दु:ख विनाश इस जीवन में असम्भव है। उसके अनुसार दुःखों को कम तो किया जा सकता है, परन्तु पूर्णत: समाप्त नहीं किया जा सकता। दु:खों की आत्यान्तिक निवृत्ति मृत्यु से ही हो सकती है। अत: मृत्यु ही मोक्ष है।

    चार्वाक धर्म व मोक्ष का खण्डन करते हुए धन व काम को जीवन का लक्ष्य मानता है। धन की उपयोगिता इसलिए है, क्योंकि यह सुख अथवा काम की प्राप्ति में सहायक है। इस प्रकार चार्वाक काम को ही चरम पुरुषार्थ मानता है। इच्छाओं की पूर्ति ही जीवन का चरम लक्ष्य है। अत: इस जीवन में जितना सुख मिले प्राप्त कर लो। स्वर्ग, नरक, पाप, पुण्य, ईश्वर आदि से भयभीत होने की जरूरत नहीं, क्योंकि इनका कोई अस्तित्व नहीं है।

    चार्वाक की उक्ति है'यावज्जीवेत् सुखं जीवेत। ऋणं कृत्वा घृतम पीबेत्' अर्थात् जब तक जियो, सुख से जियो, ऋण लेकर घी पियो। सुख के लिए चाहे ऋण लेना पड़े। किसी भी प्रकार से इन्द्रिय सुखों को प्राप्त करें। अपनी वासनाओं को दबाना अप्राकृतिक है। कामिनी से प्राप्त सुख ही चरम लक्ष्य है। चार्वाक के अनुसार, सुख जीवन में दुःख से मिश्रित है। इस कारण से हमें सुख प्राप्त करने के लिए त्याग नहीं करना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि अब दुःख मिला है, तो बाद में सुख मिल जाएगा। सुख व दु:ख अभिन्न हैं। गुलाब में काँटे होने पर भी माली फूल तोड़ना नहीं छोड़ता। मछली में कॉटा होने पर भी लोग मछली खाना नहीं छोड़ते। अत: दुःख से सुख का त्याग करना महान् मूर्खता है।

     चार्वाक कहता है कि मानव को वर्तमान सुख को प्राप्त करने के लिए हर सम्भव कोशिश करनी चाहिए। पारलौकिक सुख को प्राप्त करने के लिए इस लोक के सुखों का त्याग नहीं करना चाहिए, वर्तमान सुख पर चार्वाक अत्यधिक बल देते हैं। भूत बीत चुका है और भविष्य के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, इसलिए वर्तमान ही निश्चित है। मानव का अधिकार वर्तमान तक ही है, वर्तमान सुख ही वांछनीय है।

     अत: उपरोक्त से स्पष्ट है कि चार्वाक निकृष्ट सुखवादी है। चार्वाक द्वारा तत्त्वमीमांसा के क्षेत्र में स्थापित भौतिकवाद ने जीवन में सुख व भोगवाद को बढ़ावा दिया, जिससे समाज में बौद्धिक व नैतिक अराजकता का जन्म हुआ, परन्तु इसका एक दूसरा पक्ष यह भी है कि इसने समाज को रूढ़िवादी व अन्धविश्वासी होने से बचाया तथा भारतीय समाज को बहु-आयामी स्वरूप प्रदान किया।

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