Skip to main content

इकबाल का ईश्वर विचार

इकबाल का ईश्वर विचार 

इकबाल का ईश्वर विचार 

     इकबाल का ईश्वर विचार पूर्णतः इस्लाम के ईश्वर विचार पर आश्रित है। इस्लाम का ईश्वर एक है। वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञानी और परमशुभ है। वह सृष्टिकर्ता है तथा वह सृष्टि की कार्यविधि का निर्णायक भी है। ईश्वर के संदर्भ में इकबाल कहते है कि ‘दैवी ज्ञान सृजनात्मक है क्योंकि कुछ भी ईश्वर बाह्य नहीं है। वह स्वयं अपने ज्ञान का विषय है। वह जैसा जनता है सृजन करता है और जैसा सृजन करता है, जनता है’। इकबाल के अनुसार, बौद्धिक प्रमाणों के द्वारा ईश्वर की स्थापना नहीं हो सकती। इसके लिए एक सूझ अर्थात अन्तर्दृष्टि की आवश्यकता है। जिस प्रकार अन्तर्दृष्टि आत्म स्वरूप को प्रकाशित करती है उसी प्रकार ईश्वर स्वरूप पर भी प्रकाश दे सकती है।

----------------


Comments

Popular posts from this blog

न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice

न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice प्रमाण विचार न्याय दर्शन में 16 पदार्थों के तत्त्वज्ञान द्वारा मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है ।  'प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्क निर्णयवादजल्पवितंडाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसाधिगमः। (न्यायसूत्र, 1.1.1)  अर्थात प्रमाणादि षोडश पदार्थों के तत्त्वज्ञान से अपवर्ग (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।         प्रायः सभी भारतीय दर्शन तत्त्व विचार करने के पूर्व तत्त्व को जानने के साधन पर विचार करते हैं। ये साधन ही प्रमाण कहे जाते हैं। प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) की प्राप्ति के साधन को प्रमाण कहते हैं 'प्रमीयते अनेन इति प्रमाणम्, तथा 'प्रमाकरणं प्रमाणम्’। प्रमाण के चार प्रकार हैं -  1. प्रत्यक्ष प्रमाण  महर्षि गौतम ने न्यायसूत्र में कहा है –  इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्।  अव्यपदेशमव्यभिचारिव्यवसायात्मक प्रत्यक्षम् ।। (न्यायसूत्र) ...

वैशेषिक दर्शन का परमाणुकारणवाद या परमाणुवाद

भारतीय दर्शन Home Page Syllabus Question Bank Test Series About the Writer वैशेषिक दर्शन का परमाणुकारणवाद या परमाणुवाद वैशेषिक दर्शन का परमाणुकारणवाद या परमाणुवाद      परमाणुवाद न्याय - वैशेषिक दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है , जिसके आधार पर वे विश्व की सावयव वस्तुओं की उत्पत्ति एवं विनाश की व्याख्या करते हैं। चूँकि यहाँ परमाणुओं के आधार पर भौतिक विश्व की सृष्टि एवं विनाश की व्याख्या की जाती है , इसलिए , उनका सृष्टि सम्बन्धी सिद्धान्त परमाणुवाद कहलाता है। महर्षि गौतम परमाणु को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि परं वा गुटे अर्थात् जिसे और अधिक विभाजित न किया जा सके , वही परमाणु है अतः स्पष्ट है कि परमाणु निरवयव है तथा निरवयव होने के कारण अविभाज्य है , अविभाज्य होने के कारण नित्य है।      वैशेषिक के अनुसार , संख्यात्मक दृष्टि से परमाणु अनन्त हैं तथा सभी परमाणु स्वभावत : निष्क्रिय हैं। यद्यपि परमाणु नित्य हैं , किन्तु इनसे उत्पन्न होने वाली समस्त सावयव वस्तुएँ अनित्य हैं। अत : परमाणु संसार की...

योग दर्शन की प्रमाण मीमांसा

भारतीय दर्शन Home Page Syllabus Question Bank Test Series About the Writer योग दर्शन की प्रमाण मीमांसा योग दर्शन की प्रमाण मीमांसा पतंजलि द्वारा प्रतिपादित प्रमाण का सिद्धान्त पतंजलि ने अपने योग दर्शन में तीन प्रकार के प्रमाण की व्याख्या की है-  प्रत्यक्ष प्रमाण  अनुमान प्रमाण  आगम (शब्द) प्रमाण  प्रत्यक्ष प्रमाण      वस्तु के साथ इन्द्रिय संयोग होने से जो उसका ज्ञान होता है , उसी को प्रत्यक्ष कहते हैं। यह प्रमाण सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। यदि हमें सामने आग जलती हुई दिखाई दे अथवा हम उसके ताप का अनुभव करें , तो यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आग जल रही है। इस ज्ञान में पदार्थ और इन्द्रिय का प्रत्यक्ष सम्बन्ध होना चाहिए। प्रत्यक्ष ज्ञान ( प्रमाण ) सन्देहरहित है। यह यथार्थ और निश्चित होता है। प्रत्यक्ष ज्ञान को किसी अन्य ज्ञान के द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं होती। इसका कारण यह है कि प्रत्यक्ष स्वयं निर्विवाद है , इसलिए कहा गया है कि " प्रत्यक्षे किं प्रमाणम्। " प्रत्यक...