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सांख्य दर्शन का निरीश्वरवाद

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सांख्य दर्शन का निरीश्वरवाद

सांख्य दर्शन का निरीश्वरवाद

    ईश्वर की सत्ता को लेकर सांख्य दर्शन के भाष्यकारों में पर्याप्त मतभेद हैं। उनमें अधिकांश तो ईश्वरवाद का खण्डन करते हैं। ये भाष्यकार उन सभी आधारों का खण्डन करते हैं, जिनके आधार पर ईश्वर से सृष्टि का उद्भव एवं विकास दिखाया जाता है। सनातन सांख्य मतावलम्बी मानते हैं कि यह संसार कार्य श्रृंखला है इसलिए इसका कारण होना चाहिए, परन्तु निःसन्देह वह कारण ईश्वर नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वर को नित्य, निर्विकार एवं पूर्ण परमात्मा माना गया है। जो परमात्मा निर्विकार, स्वयंभू एवं पूर्ण है, वह परिवर्तनशील वस्तुओं का निमित्त कारण नहीं हो सकता अर्थात् वह किसी भी क्रिया का प्रवर्तक नहीं हो सकता।

    ईश्वर भौतिक तत्त्व नहीं है। अभौतिक तत्त्व से भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति नहीं हो सकती। अत: यह सिद्ध होता है कि जगत् का मूल कारण नित्य, परन्तु परिणामी (परिवर्तनशील) है। यही नित्य परिणामी कारण प्रकृति है। यह कहा जा सकता है कि प्रकृति तो जड़ है। इसकी गति को निरूपित एवं नियमित करने के लिए चेतन सत्ता आवश्यक है, जो सृष्टि उत्पन्न करती है। जीवात्माओं का ज्ञान सीमित रहता है, इसलिए जगत् के सूक्ष्म उपादान कारण को नियन्त्रित नहीं कर सकते है।

    अत: एक अनन्त बुद्धिमान चैतन्य युक्त सत्ता की कल्पना करनी चाहिए जो प्रकृति का संचालन कर सके। इसी को ईश्वर कहते हैं, परन्तु ईश्वरवादी कहते हैं कि ईश्वर कुछ नहीं करता, वह किसी क्रिया में प्रवृत्त नहीं होता, परन्तु प्रकृति का संचालन एक क्रिया है। ईश्वर चूँकि पूर्ण है, अत: उसमें अपूर्ण इच्छा सम्भव नहीं है। यदि यह कहा जाए कि ईश्वर का प्रयोजन अन्य जीवों की उद्देश्य पूर्ति है, तो शंका उठती है कि बिना अपने किसी स्वार्थ के कोई भी व्यक्ति दूसरे की उद्देश्य सिद्धि के लिए तत्पर नहीं रहता है। यदि ईश्वर में विश्वास किया जाए, तो जीवों का स्वातन्त्र्य और अमरतत्त्व बाधित हो जाता है। यदि जीवों को ईश्वर का अंश मान लें, तो उसमें ईश्वरीय शक्ति रहनी चाहिए, परन्तु यह देखने में नहीं आती, इसके विपरीत यदि उन्हें ईश्वर के द्वारा उत्पन्न मानें, तो फिर उनका मरण होना असम्भव है।

    उपरोक्त सब बातों से निष्कर्ष निकलता है कि प्रकृति ही संसार का मूल कारण है। प्रकृति अज्ञात रूप से स्वभावत: पुरुषों के कल्याण के लिए उसी तरह सृष्टि रचना करती है, जिस तरह बछड़े की सृष्टि के निमित्त गाय के थन से स्वत: दूध की धारा बहती है। सांख्य ईश्वरवाद का निषेध करता है, अत: सांख्य दर्शन निरीश्वरवादी है।

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