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चार्वाकों के द्वारा अनुमान प्रमाण की समीक्षा

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चार्वाकों के द्वारा अनुमान प्रमाण की समीक्षा

चार्वाकों के द्वारा अनुमान प्रमाण की समीक्षा

     चार्वाक के अनुसार, अनुमान प्रमाण निराधार है, क्योंकि अनुमान का आधार है व्याप्ति और व्याप्ति की स्थापना हो नहीं सकती। क्योंकि हम कभी भी सभी हेतु व साध्यों का निरीक्षण कर ही नहीं सकते, फिर कैसे कह सकते हैं कि जहाँ-जहाँ हेतु है, वहीं-वहीं साध्य है; जैसे-आज से हजारों वर्ष पहले धुआँ होगा, कैसे कह सकते हैं कि तब अग्नि होगी कि नहीं, इसी प्रकार सैकड़ों वर्ष बाद धुआँ होगा, कैसे कह सकते हैं कि तब अग्नि होगी की नहीं। चूँकि, व्याप्ति ही अनुमान का आधार है और व्याप्ति की स्थापना हो ही नहीं सकती, इसलिए अनुमान निराधार है।

     न्याय दार्शनिक चार्वाक के प्रति उत्तर कहते हैं कि हमें सभी हेतु तथा साध्यों का पृथक्-पृथक् रूप से प्रत्यक्ष करने की जरूरत नहीं है। अलौकिक प्रत्यक्ष द्वारा जब हम एक हेतु का प्रत्यक्ष करते हैं, तो उसमें जो सामान्य तत्त्व हैं, उसके माध्यम से हम दुनिया के जितने भी हेतु हैं, उन सबका प्रत्यक्ष कर लेते हैं। इसी प्रकार जब हम साध्य का प्रत्यक्ष करते हैं, तो उसमें जो सामान्य तत्त्व हैं, उनके माध्यम से दुनिया के समस्त साध्यों का प्रत्यक्ष कर लेते हैं। अत: हमें दुनिया के सभी हेतु व साध्यों का एक-एक करके प्रत्यक्ष नहीं करना पड़ता। चार्वाक कहता है कि किसी भी वस्तु में जो सामान्य तत्त्व है उसे हम कभी भी किसी एक वस्तु का प्रत्यक्ष करके ज्ञात नहीं कर सकते।

     अगर हमें यह पता लगाना है कि धुएँ का सामान्य तत्त्व क्या है, तो हमें जाकर सभी धुंओं; जैसे-लकड़ी, कागज, कोयले आदि का निरीक्षण करना होगा, तभी हमें धुएँ का सामान्य ज्ञात होगा, अन्यथा नहीं। इस प्रकार चार्वाक नैयायिकों के सामान्य लक्षण अलौकिक प्रत्यक्ष को अस्वीकार कर देता है। न्याय दार्शनिक चार्वाक के प्रति उत्तर में कहते हैं कि आखिर हम क्यों एक-एक हेतु तथा साध्य का निरीक्षण करें। सारे हेतु और साध्यों का निरीक्षण करने की आवश्यकता नहीं है। माना हम ने बीस बार रसोई में धुआँ (हेतु) देखा और इतनी ही बार धुएँ के साथ अग्नि (साध्य) को भी देखा। स्पष्ट है कि हमेशा ऐसा ही होगा कि धुआँ होगा, तो अग्नि होगी, चूँकि हमारी प्रकृति में एकरूपता है। यह तो पूर्वमानित सत्य है, इसे नैयायिकों द्वारा सिद्ध नहीं किया गया। उन्होंने मान्यता के आधार पर इसे मान लिया है। अत: यह अनुमान प्रमाण का खण्डन होता है। चार्वाक ने अनुमान का खण्डन इसलिए किया, क्योंकि उसकी मान्यता है कि अनुमान के आधार पर हमें कभी-कभी अनिश्चित ज्ञान की प्राप्ति होती है। अत: हमें अनुमान को एक प्रमाण के रूप में अस्वीकार करना होगा।

     आलोचक कहते हैं कि चार्वाक अपने तत्त्वमीमांसीय सिद्धान्तों की स्थापना तर्क द्वारा करते हैं और इन तर्कों का आधार अनुमान है; जैसे-ईश्वर तथा नित्य आत्मा आदि का प्रत्यक्ष नहीं होने पर इनके नहीं होने का अनुमान कर लेना। इसी प्रकार चार्वाक का देहात्मवाद भी अनुमान पर आधारित है। वह पान, सुपारी, चूना आदि को मिलाकर चबाने से उत्पन्न लालिमा के गुण के आधार पर यह अनुमान कर लेता है कि जब चार प्रकार के जड़ तत्त्व पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु निश्चित मात्रा में तथा निश्चित अनुपात में संयुक्त होते हैं, तो चेतना का गुण उत्पन्न हो जाता है। चार्वाक के इस तर्क का आधार अनुमान है। अत: एक ओर तो चार्वाक अनुमान का खण्डन करते हैं, दूसरी ओर वे अनुमान का सहारा भी लेते हैं, ऐसा करना तर्कतः अनुचित है।

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