Skip to main content

गाँधी का सत्याग्रह

गाँधी का सत्याग्रह 

गाँधी का सत्याग्रह  

   गाँधीजी की सत्याग्रह अवधारणा का विचार न्यूटेस्टामेण्ट और विशेषतया सरमन ऑन द माउण्ट से आया। सत्याग्रह दो शब्दों से बना है- 'सत्य+आग्रह' अर्थात् साध्य रूप सत्य को प्राप्त करने के लिए जीवनपर्यन्त उसके लिए आग्रह करना और उस पर जीवनपर्यन्त दृढ रहना ही सत्याग्रह है। इसका मूल लक्ष्य सामने वाले व्यक्ति में हृदय परिवर्तन है। अहिंसा या प्रेम ही इसका मूलाधार है, क्योंकि इसके अनुसार बुरे-से-बुरे व्यक्ति में भी शुभ या सत्य का अहं विद्यमान रहता है। गाँधीजी के अनुसार, सत्य तो ईश्वर है, अतः सत्याग्रह ईश्वरीय आग्रह है। व्यावहारिक दृष्टि से इसका अर्थ हो जाता है- “सत्य के प्रति पूर्ण निष्ठा”।

सत्याग्रही बनने के लिए आवश्यक गुण 

गाँधीजी के अनुसार, एक सत्याग्रही में निम्नलिखित गुण होने चाहिए –

Ø  सत्याग्रही असीम धैर्यवान होना चाहिए।

Ø  सत्याग्रही पूर्णतया ईमानदार एवं अपने संकल्प के प्रति पूर्ण निष्ठावान हो।

Ø  सत्याग्रही को खुले मन का होना आवश्यक है, तभी वह हृदय परिवर्तन करा सकता है।

Ø  उसे पूर्णतया अनुशासित होना चाहिए।

Ø  उसे पूर्णतया निर्भयी होना चाहिए।

Ø  उसमें बलिदान, कष्ट झेलने की क्षमता व विनम्रहृदयी होना चाहिए।

Ø  अहंकार से उसे मुक्त रहना चाहिए।

Ø  सत्य एवं अहिंसा का पालन मनसा वाचा कर्मणा का अनुसरण करना चाहिए।

Ø  उसे अपने विश्वास और आचरण के प्रति अडिग रूप से समर्पित होना चाहिए।

Ø  उसके विचारों में एकरूपता होनी चाहिए। ऐसा न होने पर गलत प्रवृत्तियों के उदय होने की सम्भावना रहेगी।

Ø  उसे स्वार्थमूलक प्रवृत्तियों से दूर रहना चाहिए।

Ø  उसे अपने व्यक्तित्व में अनिवार्य सद्गुणों को आत्मसात करना चाहिए।

Ø  उसे सहिष्णु तथा सहनशक्ति होना चाहिए।

 

सत्याग्रह के प्रकार

Ø  असहयोग आन्दोलन

Ø  सविनय अवज्ञा आन्दोलन

Ø  हिजरत या प्रवजन

Ø  अनशन

Ø  हड़ताल

---------------------


Comments

Popular posts from this blog

न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice

न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice प्रमाण विचार न्याय दर्शन में 16 पदार्थों के तत्त्वज्ञान द्वारा मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है ।  'प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्क निर्णयवादजल्पवितंडाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसाधिगमः। (न्यायसूत्र, 1.1.1)  अर्थात प्रमाणादि षोडश पदार्थों के तत्त्वज्ञान से अपवर्ग (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।         प्रायः सभी भारतीय दर्शन तत्त्व विचार करने के पूर्व तत्त्व को जानने के साधन पर विचार करते हैं। ये साधन ही प्रमाण कहे जाते हैं। प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) की प्राप्ति के साधन को प्रमाण कहते हैं 'प्रमीयते अनेन इति प्रमाणम्, तथा 'प्रमाकरणं प्रमाणम्’। प्रमाण के चार प्रकार हैं -  1. प्रत्यक्ष प्रमाण  महर्षि गौतम ने न्यायसूत्र में कहा है –  इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्।  अव्यपदेशमव्यभिचारिव्यवसायात्मक प्रत्यक्षम् ।। (न्यायसूत्र) ...

वैशेषिक दर्शन का परमाणुकारणवाद या परमाणुवाद

भारतीय दर्शन Home Page Syllabus Question Bank Test Series About the Writer वैशेषिक दर्शन का परमाणुकारणवाद या परमाणुवाद वैशेषिक दर्शन का परमाणुकारणवाद या परमाणुवाद      परमाणुवाद न्याय - वैशेषिक दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है , जिसके आधार पर वे विश्व की सावयव वस्तुओं की उत्पत्ति एवं विनाश की व्याख्या करते हैं। चूँकि यहाँ परमाणुओं के आधार पर भौतिक विश्व की सृष्टि एवं विनाश की व्याख्या की जाती है , इसलिए , उनका सृष्टि सम्बन्धी सिद्धान्त परमाणुवाद कहलाता है। महर्षि गौतम परमाणु को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि परं वा गुटे अर्थात् जिसे और अधिक विभाजित न किया जा सके , वही परमाणु है अतः स्पष्ट है कि परमाणु निरवयव है तथा निरवयव होने के कारण अविभाज्य है , अविभाज्य होने के कारण नित्य है।      वैशेषिक के अनुसार , संख्यात्मक दृष्टि से परमाणु अनन्त हैं तथा सभी परमाणु स्वभावत : निष्क्रिय हैं। यद्यपि परमाणु नित्य हैं , किन्तु इनसे उत्पन्न होने वाली समस्त सावयव वस्तुएँ अनित्य हैं। अत : परमाणु संसार की...

भारतीय दर्शन का स्वरूप एवं परिचय (Nature and Introduction of Indian Philosophy)

भारतीय दर्शन का स्वरूप एवं परिचय  (Nature and Introduction of Indian Philosophy) भारतीय दर्शन का स्वरूप भारतीय दर्शन की पृष्ठभूमि एवं साहित्य      भारतीय दर्शन का सार तत्त्व साक्षात्कार है जिससे मनुष्य समस्त दु:खों से निवृत्त हो जाता है। सांख्यकारिका में वर्णित है कि, “दु:ख त्रयाभिधाता जिज्ञासा तदपद्यात” अर्थात् आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दु:खों से निवृत्ति के लिए दार्शनिक जिज्ञासा करनी चाहिए।  यह जिज्ञासा जीव के मोक्ष का आधार है। भारतीय दर्शन जीव उस विवेक ज्ञान को प्राप्त करता है जिसको जान लेने से कुछ भी अज्ञात शेष नहीं रहता। भारतीय दर्शन एक ऐसी दिव्यदृष्टि प्रदान करता है जिससे आत्मदर्शन व तत्त्वदर्शन सम्भव हो जाता है।      भारतीय दर्शन का प्रारम्भ प्रतिपक्ष के रूप में चार्वाक दर्शन से होता है ओर विस्तार होता हुआ अन्त में मुक्ति के मार्ग अर्थात योगदर्शन पर समाप्त हो जाता है। भारतीय दार्शनिक विचारों का मूल यद्यपि वेद है परन्तु इसका एक सुव्यवस्थित तथा क्रमबद्ध रूप सर्वप्रथम सूत्र ग्रंथों में मिलता है। सूत्र शब्द का अर्थ सूत है अर्थात “स्...