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संविधानवाद ( Constitutionalism )

संविधानवाद ( Constitutionalism ) 

संविधानवाद ( Constitutionalism ) 

   संविधानवाद एक आधुनिक विचारधारा है जो विधि द्वारा नियंत्रित राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना पर बल देती है। पीटर एच मार्क के अनुसार, ‘संविधानवाद का तात्पर्य सुव्यवस्थित और संगठित राजनीतिक शक्ति को नियन्त्रण में रखना है’। कार्ल जे फैडरिक के अनुसार, ‘शक्तियों का विभाजन सभ्य सरकार का आधार है, यही संविधानवाद है’। कॉरी और अब्राहम के अनुसार, ‘स्थापित संविधान के निर्देशों के अनुरूप शासन को संविधानवाद कहते है’। जे एस राउसेक के अनुसार, ‘धारणा के रूप में संविधानवाद का अर्थ है कि यह अनिवार्य रूप से सीमित सरकार तथा शासित तथा शासन के ऊपर नियंत्रण की एक व्यवस्था है’। के सी व्हीयर के अनुसार, ‘संवैधानिक शासक का अर्थ किसी शासन के नियमों के अनुसार शासन चलाने से अधिक कुछ नहीं है। इस प्रकार इस सभी परिभाषाओं से स्पष्ट है कि “संविधानवाद सीमित शासन का प्रतीक है”।

संविधानवाद की तीन प्रमुख अवधारनाएं है –

  1. पाश्चात्य अवधारणा – यह अवधारणा लोकतन्त्र में पूंजीवाद का समर्थन करती है। इसे उदारवादी लोकतंत्रितक अवधारणा भिक कहते है।
  2. साम्यवादी अवधारणा – यह लोकतन्त्र में समाजवाद का समर्थन करती है। इसे मार्क्सवादी अवधारणा भी कहते है।
  3. विकसित लोकतान्त्रिक अवधारणा – यह अवधारणा उन राज्यों में विकसित हुई जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्वतंत्र हुए। इस अवधारणा की ‘तृतीय विश्व’ के नाम से भी जानी जाती है।
  • संविधानवाद के प्रमुख तत्व - संविधानवाद के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित है -
  • संविधानवाद व्यक्ति स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
  • सविधानवाद राजनीतिक सत्ता पर अंकुश की स्थापना करता है।
  • संविधानवाद शक्ति के विकेन्द्रीकरण और संतुलन को स्थापित करता है।
  • संविधानवाद साधनों के प्रयोग से परिवर्तन की मान्यता की स्थापना करता है।
  • संविधानवाद समस्त शासन में विश्वास रखता है।
  • संविधानवाद का उत्तरदायी सरकार में विश्वास रखता है।
  • संविधानवाद की विशेषताएं
  • संविधानवाद एक मूल्य सम्बद्ध अवधारणा है।
  • संविधानवाद संस्कृतबद्ध अवधारणा है।
  • संविधानवाद एक गतिशील अवधारणा है।
  • संविधानवाद साध्य मूलक अवधारणा है।
  • संविधानवाद एक सहभागी अवधारणा है।
  • संविधानवाद संविधान सम्मत अवधारणा है।

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