Thursday, May 19, 2022

डी डी उपाध्याय का अद्वैत वेदान्त विचार

डी डी उपाध्याय का अद्वैत वेदान्त विचार 

डी डी उपाध्याय का अद्वैत वेदान्त विचार 

    उपाध्याय जी का मत था कि समग्र मानवतावाद ने आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा विकसित अद्वैत परम्परा का पालन किया है । गैर-द्वैतवाद ब्रह्माण्ड में प्रत्येक वस्तु एकीकृत के सिद्धान्त का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका एक मुख्य भाग मानव जाति भी है । समग्र मानवतावाद गाँधी के भावी भारत के दृष्टिकोण का स्पष्ट उदाहरण है । उपाध्याय एवं गाँधीजी दोनों समाजवाद और पूँजीवाद के भौतिकवाद को समान रूप से अस्वीकार करते हैं । दोनों एकांकी वर्ग-धर्म आधारित समुदाय के पक्ष में आधुनिक समाज के व्यक्तिवाद को अस्वीकार करते हैं तथा दोनों ही राजनीति में धार्मिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के उल्लंघन का विरोध करते हैं । दोनों ही हिन्दू मूल्यों को संरक्षित करने वाले सांस्कृतिक एवं आधुनिकीकरण की प्रमाणित विधि चाहते हैं । समग्र मानवतावाद में राजनीति और स्वदेशी, इन दो विषयों के आस-पास दर्शन आयोजित है ।

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डी डी उपाध्याय का समग्र मानववाद विचार

डी डी उपाध्याय का समग्र मानववाद विचार 

डी डी उपाध्याय का समग्र मानववाद विचार 

    उपाध्याय जी ने मानवता के समग्र विकास पर चिन्तन को 'अन्त्योदय' के नाम से भी जाना जाता है । वे मानते थे कि जब तक निर्धनों तथा पिछड़े लोगों का आर्थिक विकास नहीं किया जाएगा, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं की जाएगी, तब तक देश का समग्र विकास सम्भव नहीं है । अन्त्योदय एक विचार नहीं, एक पद्धति है, जिसका क्रियान्वयन होना आवश्यक है । उपाध्याय के अनुसार, "प्रत्येक भारतवासी हमारे रक्त और मांस का हिस्सा है । हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक हम हर एक को आभास न करा दें, कि पाश्चात्य सिद्धान्त स्वयं में एकांगी विकास को समेटे हुए थे, फिर चाहे वह समाजवाद हो, पूँजीवाद, साम्यवाद, उदारवाद हो अथवा व्यक्तिवाद ।इन सबका एक ही लक्ष्य उभरकर सामने आया वह है एकांगी विकास । देश का समग्र विकास करने के लिए एक नवीन सिद्धान्त, दर्शन अथवा विकास की आवश्यकता थी, जिसे उपाध्याय के समग्र मानवतावाद ने पूर्ण किया ।

    उनका मानना था कि पश्चिमी संस्कृति के उन्हीं तत्त्वों को अपनाओ जो विकास में सहायक हैं, परन्तु पश्चिमी संस्कृति से दूर रहे हों, क्योंकि यह मानव कल्याण के लिए नहीं, अपितु मानव की अवनति के लिए हैं । यह एकांगी विकास के लिए हैं और जब तक मानव का समग्र विकास नहीं होगा, तब तक सुख-शान्ति की कल्पना करना भी सम्भव नहीं । उपाध्याय कहते हैं 'एकात्म मानव दर्शन' राष्ट्रवाद के दो परिभाषित लक्षणों को पुनर्जीवित करता है । पहला चित्त (राष्ट्र की आत्मा) तथा दूसरा विराट (वह शक्ति जो शब्द को ऊर्जा प्रदान करे)।

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दीन दयाल उपाध्याय ( Deendayal Upadhyaya

दीन दयाल उपाध्याय ( Deendayal Upadhyaya 

दीन दयाल उपाध्याय ( Deendayal Upadhyaya ) 

    पण्डित दीनदयाल उपाध्याय (जन्म: 25 सितम्बर 191611 फरवरी 1968) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिन्तक और संगठनकर्ता थे। वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद नामक विचारधारा दी। वे एक समावेशित विचारधारा के समर्थक थे जो एक मजबूत और सशक्त भारत चाहते थे। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य में भी उनकी गहरी अभिरुचि थी। उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं में कई लेख लिखे, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।

    दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता माने जाते हैं। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता की पुनर्रचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टि प्रदान करना था। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए एकात्म मानववाद की विचारधारा दी। उन्हें जनसंघ की आर्थिक नीति का रचनाकार माना जाता है। उनका विचार था कि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख है।

   संस्कृतिनिष्ठा उपाध्याय के द्वारा निर्मित राजनैतिक जीवनदर्शन का पहला सूत्र है। उनके शब्दों में-

भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा।

वसुधैव कुटुम्बकम्भारतीय सभ्यता से प्रचलित है। इसी के अनुसार भारत में सभी धर्मों को समान अधिकार प्राप्त हैं। संस्कृति से किसी व्यक्ति, वर्ग, राष्ट्र आदि की वे बातें, जो उसके मन, रुचि, आचार, विचार, कला-कौशल और सभ्यता की सूचक होती हैं, पर विचार होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जीवन जीने की शैली है।

   उपाध्याय जी पत्रकार होने के साथ-साथ चिन्तक और लेखक भी थे। उनकी असामयिक मृत्यु से यह बात स्पष्ट है कि जिस धारा में वे भारतीय राजनीति को ले जाना चाहते थे वह धारा हिन्दुत्व की थी। इसका संकेत उन्होंने अपनी कुछ कृतियों में भी दे दिया था। उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकों के नाम नीचे दिये गये हैं-

·         दो योजनाएँ

·         राजनीतिक डायरी

·         राष्ट्र चिन्तन : यह पुस्तक दीनदयाल उपाध्याय द्वारा दिए गए भाषणों का संग्रह है ।

·         भारतीय अर्थ नीति : विकास की एक दिशा

·         भारतीय अर्थनीति का अवमूल्यन

·         सम्राट चन्द्रगुप्त

·         जगद्गुरु शंकराचार्य

·         एकात्म मानववाद (अंग्रेजी: Integral Humanism)

·         राष्ट्र जीवन की दिशा

·         एक प्रेम कथा

दीन दयाल उपाध्याय ( Deendayal Upadhyaya ) के दार्शनिक विचार 

डी डी उपाध्याय का समग्र मानववाद विचार

डी डी उपाध्याय का अद्वैत वेदान्त विचार

डी डी उपाध्याय का पुरुषार्थ विचार

अम्बेडकर का नवबुद्धवाद

अम्बेडकर का नवबुद्धवाद 

अम्बेडकर का नवबुद्धवाद 

    डॉ० भीमराव अम्बेडकर को नव बौद्ध दर्शन का जनक माना जाता है। 14 अक्टूबर 1956 को महाराष्ट्र के नागपूर में भुक्षु चंद्रमणि द्वारा इन्होंने बुद्ध धम्म की दीक्षा ली। उन्होंने बुद्ध धम्म को अपनाने के बारें में कहा था – “बुद्ध का धम्म ही केवल एक ऐसा धर्म है जिसे विज्ञान द्वारा जागृत समाज ग्रहण कर सकता है और जिसके बिना वह नष्ट हो जाएगा । आधुनिक संसार को भी खुद को बचाने के लिए बुद्धधम्म को अपनाना होगा । अम्बेडकर बुद्ध धम्म के विषय में कहते है “मैं बुद्ध धर्म को इसलिए पसंद करता हूँ क्योंकि यह एक साथ तीन सिद्धान्त देता है जो दूसरा कोई धर्म नहीं देता । दूसरे सभी धर्म ईश्वर, आत्मा और मृत्यु के बाद का जीवन में उलझे हुए हैं । बुद्ध धर्म अंधविश्वास और अलौकिकता के मुकाबले में प्रज्ञा (ज्ञान) सिखाता है । यह करुणा (प्रेम) सिखाता है। यह समता (समानता) की शिक्षा देता है । बुद्ध धर्म के ये तीन सिद्धान्त मुझे अकृषित करते हैं। दुनिया को भी ये तीनों सिद्धान्त पसंद आने चाहिए । न तो ईश्वर और न आत्मा संसार को बचा सकते है” ।

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अम्बेडकर का हिन्दुवाद दर्शन

अम्बेडकर का हिन्दुवाद दर्शन 

अम्बेडकर का हिन्दुवाद दर्शन 

हिन्दू धर्म संस्था के बारे में डॉ. अम्बेडकर ने अपना दृष्टिकोण निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया है –

“जो धर्म इंसानों में मानवीय बर्ताव को वर्जित करता है वह धर्म, धर्म नहीं है, बल्कि एक दण्ड है, एक सजा है” ।

जिन कारणों से डॉ. अंबेडकर ने हिन्दूवाद का त्याग किया, उनकी व्याख्या, उन्होंने इस प्रकार की है –

1.    अज्ञान को प्रोत्साहन - हिन्दूवाद अज्ञान का उत्पादक, पालक और प्रचारक है । गीता का यह आदेश कि 'अज्ञानी को अज्ञानी ही रहने दो, किसी प्रकार के बौद्धिक विकास की गुंजाइश नहीं छोड़ता ।

2.   नैतिकता का अभाव - नैतिकता हिन्दूवाद की बुनियाद नहीं । जैसे - रेल के किसी डिब्बे को कभी गाड़ी से जोड़ दिया जाता है तो कभी अलग कर लिया जाता है, ऐसे ही हिन्दूवाद में नैतिकता का स्थान है ।

3.   असमता - जातिभेद, छुआछात, भेदभाव और क्रमवार ना-बराबरी हिन्दूवाद के अभिन्न अंग हैं क्योंकि उनको हिन्दू धर्म शास्त्रों का समर्थन प्राप्त है, इनको मिटाने का मतलब है हिन्दूवाद को मिटाना । हिन्दू यह करने के लिए न कभी पहले तैयार थे, न इसके लिए आज सहमत हैं और न रहे है।

डॉ. आंबेडकर ने सच कहा है, 'आधुनिक हिन्दूवाद जातिभेद की चट्टान पर स्थिर है। कोई भी तर्क इसे अस्थिर नहीं कर सकता।

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अम्बेडकर का जाति उच्छेदन विचार

अम्बेडकर का जाति उच्छेदन विचार 

अम्बेडकर का जाति उच्छेदन विचार 

    आंबेडकर के विख्यात भाषण एनीहिलेशन ऑफ कास्ट ( 1936 ) के ललई सिंह यादव द्वारा कृत हिंदी-रूपांतर “जाति-भेद का उच्छेद” के दो प्रकरणों इस विषय पर है । यह भाषण जाति-पाँति तोड़क मंडल ( लाहौर ) के वार्षिक सम्मेलन ( सन् 1936 ) के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार किया गया था, परंतु इसकी क्रांतिकारी दृष्टि से आयोजकों की पूर्णतः सहमति न बन सकने के कारण सम्मेलन ही स्थगित हो गया और यह पढ़ा न जा सका । बाद में, आंबेडकर ने इसे स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर वितरित किया, जो पर्याप्त लोकप्रिय हुई । उनके अनुसार समानता, स्वतंत्रता व बंधुता - ये तीन तत्त्व आदर्श समाज में अनिवार्यतः होने चाहिए, जिससे लोकतंत्र सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया के अर्थ तक भी पहुँचे।

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भीमराव आम्बेडकर ( B. R. Ambedkar )

भीमराव आम्बेडकर ( B. R. Ambedkar ) 

भीमराव आम्बेडकर ( B. R. Ambedkar ) 

    भीमराव रामजी आम्बेडकर (14 अप्रैल, 1891 6 दिसंबर, 1956, डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर नाम से लोकप्रिय, भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे। उन्होंने दलित बौद्ध आन्दोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मन्त्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे।

आम्बेडकर का साहित्य

1.    एडमिनिस्ट्रेशन एंड फिनांसेज़ ऑफ़ द ईस्ट इंडिया कंपनी

2.   द एवोल्यूशन ऑफ़ प्रोविंशियल फिनांसेज़ इन ब्रिटिश इंडिया

3.   दी प्राब्लम आफ दि रुपी : इट्स ओरिजिन एंड इट्स सॉल्यूशन

4.   अनाइहिलेशन ऑफ कास्ट्स (जाति प्रथा का विनाश)

5.   विच वे टू इमैनसिपेशन

6.   फेडरेशन वर्सेज़ फ्रीडम

7.    पाकिस्तान और द पर्टिशन ऑफ़ इण्डिया/थॉट्स ऑन पाकिस्तान

8.   रानडे, गांधी एंड जिन्नाह

9.   मिस्टर गांधी एण्ड दी एमेन्सीपेशन ऑफ़ दी अनटचेबल्स

10.  वॉट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स

11.   कम्यूनल डेडलाक एण्ड अ वे टू साल्व इट

12.  हू वेर दी शूद्राज़

13.  भारतीय संविधान में परिवर्तन हेतु कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों का, अनुसूचित जनजातियों (अछूतों) पर उनके असर के सन्दर्भ में दी गयी समालोचना

14.  द कैबिनेट मिशन एंड द अंटचेबल्स

15.  स्टेट्स एण्ड माइनोरीटीज

16.  महाराष्ट्र एज ए लिंग्विस्टिक प्रोविन्स स्टेट

17.  द अनटचेबल्स: हू वेर दे आर व्हाय दी बिकम अनटचेबल्स

18.  थॉट्स ऑन लिंगुइस्टिक स्टेट्स: राज्य पुनर्गठन आयोग के प्रस्तावों की समालोचना

19.  द बुद्धा एंड हिज धम्मा (भगवान बुद्ध और उनका धम्म)

20. रिडल्स इन हिन्दुइज्म

21.  डिक्शनरी ऑफ पाली लॅग्वेज (पालि-इग्लिश)

22. द पालि ग्रामर (पालि व्याकरण)

23. वेटिंग फ़ॉर अ वीज़ा (आत्मकथा)

24. अ पीपल ऐट बे

25. द अनटचेबल्स और द चिल्ड्रेन ऑफ़ इंडियाज़ गेटोज़

26. केन आय बी अ हिन्दू?

27. व्हॉट द ब्राह्मिण्स हैव डन टू द हिन्दुज

28. इसेज ऑफ भगवत गिता

29. इण्डिया एण्ड कम्यूनिज्म

30. रेवोलोटिओं एंड काउंटर-रेवोलुशन इन एनशियंट इंडिया

31.  द बुद्धा एंड कार्ल मार्क्स (बुद्ध और कार्ल मार्क्स)

32. कोन्स्टिट्यूशन एंड कोस्टीट्यूशनलीज़म

भीमराव आम्बेडकर ( B. R. Ambedkar ) के दार्शनिक विचार 

अम्बेडकर का जाति उच्छेदन विचार

अम्बेडकर का हिन्दुवाद दर्शन

अम्बेडकर का नवबुद्धवाद

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विश्व के लोगों को चार्वाक दर्शन का ज्ञान क्यों जरूरी है ?

विश्व के लोगों को चार्वाक दर्शन का ज्ञान क्यों जरूरी है ? चार्वाक दर्शन की एक बहुत प्रसिद्ध लोकोक्ति है – “यावज्जजीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्...