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शंकर द्वारा परिणामवाद का खण्डन

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शंकर द्वारा परिणामवाद का खण्डन

शंकर द्वारा परिणामवाद का खण्डन

परिणामवाद का खण्डन – (प्रकृति परिमाणवाद की सिद्धि अनुमान व शब्द प्रमाण से असंभव है)

    शंकर के अनुसार सांख्य-योग दर्शनों का परिणामवाद सिद्धान्त प्रमाणों की दृष्टि से खण्डनीय है। क्योंकि अचेतन प्रकृति बिना किसी चेतन सत्ता का आश्रय लिये हुए प्रवृत्त नहीं हो सकती। जैसे स्वर्णादि से बने कंगन के लिए उपादान (Material) कारण के रूप में स्वर्णकार आदि चेतन आधार प्राप्त होते हैं। वैसे ही चेतन सत्ता का बिना सहारा लिये प्रकृति का सुख, दुःख और मोहात्मक पदार्थों का कारण होना भी आवश्यक है। यदि साधन साध्याभाव से व्याप्त हो तो विरुद्ध हेतु नाम का हेत्वाभास होता है। अतः यहाँ पर उसी प्रकार का विरुद्ध हेतु है जिस तरह किसी वस्तु को नित्य सिद्ध करने के लिए हेतु दें कि 'यह उत्पन्न होती है' जबकि उत्पन्न होने के कारण वह वस्तु अनित्य (साध्याभाव) स्वयं ही सिद्ध हो जायगी कि यह नित्य नहीं है। उसी तरह सांख्य के द्वारा यह सिद्ध करने के लिए कि प्रकृति चेतन की सहायता नहीं लेते हुए भी सुखादि से युक्त पदार्थों को उत्पन्न करती है प्रमाणिक नहीं रह जाता।

    इसके अतिरिक्त उक्त साधन स्वरूपासिद्ध भी है। सुख, दुःख और मोह आन्तरिक भाव है जो अन्तरिन्द्रिय मन के द्वारा ज्ञेय हैं जब कि चन्दनादि पदार्थ बाह्य भाव है जो चक्षुः, श्रोत्र आदि बाहरी इन्द्रियों से ग्राह्य हैं। अतः चन्दनादि दूसरे प्रत्ययों को साधनों के रूप में ज्ञेय होते हैं तथा सुखादि उनसे अलग रहकर इन्द्रियों के ऊपर दिखलाई पड़ते हैं। स्वरूपासिद्ध वह हेतु है जो पक्ष में न रहे जैसेशब्द एक गुण है क्योंकि यह चाक्षुष है। यहाँ चाक्षुषत्व-हेतु पक्ष (शब्द) में नहीं रहता है। उसी प्रकार चन्दनादि पदार्थों (पक्ष) में सुख, दुःख और मोह का अन्वय (हेतु) रखते हैं जो असिद्ध है। सुखादि आन्तर भाव हैं चन्दनादि बाह्य भाव। दोनों में एकता नहीं है अर्थात् एक ही प्रत्यय से दोनों का बोध नहीं होता। सुख और विषय विभिन्न प्रत्ययों से ज्ञेष हैं अतः दोनों का एक ही स्वभाव नहीं हो सकता। दोनों को एक मान लेने पर दोष होता है। यदि चन्दनादि का स्वभाव सुखादि होता तो हेमन्त काल में भी चन्दन सुख ही देता परंतु ऐसा तो नहीं होता कि चन्दन कभी अ-चन्दन हो जाता है। स्वभाव का अर्थ निरन्तर सम्बन्ध होना ही है। यदि सुख चन्दन का स्वभाव है तो कभी छूटना नहीं चाहिए। तब क्या कारण है कि शीतकाल में वह सुखद नहीं होता? अवश्य ही चन्दन सुख-स्वभाव नहीं है। उसी प्रकार ग्रीष्मकाल में भी कुंकुम लेप से सुख मिलता। ऐसी बात तो नहीं होती कि कभी-कभी कुंकुम का लेप अपना स्वभाव छोड़कर अकुंकुम लेप हो जाता है। इसी प्रकार काँटा जैसे ऊँट को सुख देता है उसी प्रकार मनुष्यादि प्राणियों को भी सुख देने लगता। ऐसी बात नहीं है कि कुछ लोगों के लिए ही वह काँटा दुःखद है। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि उक्त हेतु असिद्ध है। तात्पर्य यह है कि प्रकृति को सुखादि के रूप में सांख्य लोग तभी सिद्ध करते हैं जब संसार के पदार्थों को सुखादि-उत्पादक मानें। लेकिन यह प्रमाण सिद्ध है कि कोई भी पदार्थ स्वभावतः सुखात्मक, दुःखात्मक या मोहात्मक नहीं है। परिस्थितियाँ उसे वैसा बना देती हैं। अतः प्रकृति को सिद्ध करने वाले अनुमान में हेतु ही असिद्ध (Unproved) है।

    प्रकृति को जगत् का कारण बतलाने वाले सिद्धान्त की पुष्टि के लिए श्रुति भी प्रमाण नहीं हो सकती। कारण यह है कि छान्दोग्य उपनिषद् में अग्नि का जो लाल रूप है वह तेज का रूप है, उजला रूप जल का और काला रूप अन्न का है' (छां० 6।4।1) इस प्रकार तेज, जल और अन्न रूपी प्रकृति के लाल, उजला और काला- ये तीन रूप दिये गये है। ये तीनों रूप ‘अजामेकाम्’ प्रत्यभिज्ञा (Recognition) से जाने जाते हैं। यहाँ पर एक तो वैदिक प्रत्यभिज्ञा प्रबल है, दूसरे लोहित आदि शब्दों में मुख्यार्थ ग्रहण करना संभव भी है । सांख्य में लोहित आदि शब्दों का मुख्यार्थं न लेकर लक्षणा से, रजकत्व आदि धर्मों की समानता देखकर इनका अर्थ रजस्, सत्व, तमस् तीन गुण के रूप में किया गया है। परंतु शंकराचार्य इनका खंडन करके कहते हैं कि जब मुख्य अर्थ लेना संभव है, तब लक्षणा क्यों लें? इसलिए इस श्रुति का अर्थ यही हुआ कि तेज, जल और अन्न रूपी प्रकृति ही जरायुज (गर्भाशय से उत्पन्न), अण्डज (पक्षी, सर्प, मछली आदि), स्वेदज (पसीने या गर्मी से उत्पन्न- कीड़े, मच्छड़, खटमल आदि) तथा उद्भिज्ज (पृथ्वी को फाड़कर निकलनेवाले पेड़-पौधे) इन चारों प्रकार के जीवसमूह का कारण है। चूंकि तेज, जल और अन्न प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं इसलिए इन्हें 'न जन्म लेनेवाला' कहकर यौगिक संज्ञा अर्थात वृत्ति के रूप में 'अजा' नहीं कह सकते। रूढि-संज्ञा के रूप में उस प्रकृति को अजा इसलिए कहते हैं कि आसानी से समझ में आ जाये।  इसलिए 'अजामेकाम्' इत्यादि श्रुति भी प्रकृति के परिमाणवाद का प्रतिपादन करनेवाली नहीं है।

    इस प्रकार शंकर सांख्य के प्रकृति परिमाणवाद का खण्डन करते है और कहते है कि यह जगत स्वयं नहीं बनता बल्कि इससे बनाने वाला कोई चेतन है जिसे शंकर ‘ब्रह्म’ कहते है।

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