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बौद्ध दर्शन के सम्प्रदाय

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बौद्ध दर्शन के सम्प्रदाय

बौद्ध दर्शन के सम्प्रदाय

      महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों में बँट गया- प्रथम हीनयान एवं द्वितीय महायान। हीनयान को थेरावाद भी कहते हैं। हीनयान में बौद्ध धर्म का प्राचीन रूप पाया जाता है। दोनों सम्प्रदायों के साथ भिन्न धाराएँ विकसित हुईं। इनमें हीनयान से सम्बद्ध वैभाषिक व सौत्रान्तिक तथा महायान से सम्बन्धित योगाचार व माध्यमिक हैं। इनका वर्णन इस प्रकार है-

वैभाषिक

     वैभाषिक का एक अन्य नाम 'सर्वास्तिवाद' है। वैभाषिक या सर्वास्तिवाद का मानना है कि जगत् की समस्त वस्तुओं की सत्ता है। वैभाषिक चित्त और बाह्य वस्तुओं के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। नव्य वस्तुवादियों की तरह इनका भी मानना है कि वस्तुओं का ज्ञान प्रत्यक्ष को छोड़कर किसी अन्य तरीके से नहीं हो सकता। वस्तुओं के बिना प्रत्यक्ष के अनुमान द्वारा अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। यदि किसी व्यक्ति को बाह्य वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं हुआ हो, तो उसे वस्तु के प्रतिरूप को ग्रहण करने में कठिनाई होगी। इस प्रकार वैभाषिक बाह्य प्रत्यक्षवादी भी है।

सौत्रान्तिक

    इस सूत्र के मूल प्रतिष्ठापक कुमारलात थे। सूत्रान्तों को प्रमाण मानने के कारण ये सौत्रान्तिक कहलाए। सौत्रान्तिक चित्त व बाह्य जगत दोनों की सत्ता को मानते हैं। इनकी मान्यता है कि यदि बाह्य वस्तुओं का अस्तित्व न माना जाए, तो उनकी प्रतीति सम्भव नहीं हो सकेगी। वस्तुओं के वर्तमान रहने पर ही उनका प्रत्यक्ष होता है। इनकी मान्यता है कि पदार्थों में सादश्य तभी सम्भव है, जब दोनों का अस्तित्व अलग-अलग हो। दोनों को एक मान लेने पर उनकी सादृश्यता का ज्ञान सम्भव नहीं हो सकेगा। घट हमारे बाहर है और ज्ञान अन्दर है, इसका स्पष्ट अनुभव होता है। अत: वस्तु को ज्ञान से भिन्न मानना चाहिए। यदि घट में तथा मुझमें कोई भेद नहीं होता, तो मैं कहता कि मैं ही घट हूँ।

      दूसरी बात यह है कि बाह्य वस्तुओं का कोई अस्तित्व नहीं होता, तो घट एवं पट दोनों यदि केवल ज्ञान हैं, तो दोनों एक हैं, लेकिन घट ज्ञान तथा पट ज्ञान को हम एक नहीं मानते हैं। अत: स्पष्ट है कि दोनों में वस्तु सम्बन्धी भेद अवश्य है। इस प्रकार हम देखते हैं कि बाह्य वस्तुओं का अस्तित्व आवश्यक है। बाह्य वस्तुओं के अनेक आकार होने के कारण ही ज्ञान के भिन्न-भिन्न आकार होते हैं। विभिन्न आकार के ज्ञानों से हम अनेक कारणस्वरूप विभिन्न बाह्य वस्तुओं का अनुमान कर सकते हैं।

योगाचार (विज्ञानवाद)

     योगाचार या विज्ञानवाद महायान दर्शन का एक दार्शनिक निकाय है। मैत्रेयनाथ को इसका संस्थापक माना जाता है। उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ 'अभिसमयालंकार' है। विज्ञानवाद में इस बात पर बल दिया जाता है कि केवल विज्ञानों की ही सत्ता है, बाह्य वस्तु की कोई सत्ता नहीं है। इस संसार में या तो विज्ञान है या विज्ञानों की पुंजरूप बाह्य वस्तुएँ हैं।

     इस मत को योगाचार कहते हैं। इसे योगाचार इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह योग एवं साधना पर बल देता है। महायान सम्प्रदाय की योगाचार विचारधारा की स्थापना है कि विज्ञान ही एकमात्र सत् है। उनकी यह स्थापना विज्ञानवाद कहलाती है। योगाचार सम्प्रदाय युक्तियों के आधार पर विज्ञान की एकमात्र सत्ता का प्रतिपादन करता है। उसकी युक्तियों के दो प्रकार हैं-प्रथम वर्ग में बाह्य पदार्थ का निषेध होता है एवं द्वितीय वर्ग में विज्ञान की एकमात्र सत्ता की स्थापना होती है। योगाचार जिन युक्तियों के आधार पर विज्ञानों की सत्ता स्थापित करता है, वे निम्न प्रकार से हैं-

    यदि कोई बाह्य वस्तु है भी, तो उसका ज्ञान सम्भव नहीं है। मान लीजिए घड़ा एक बाह्य वस्तु है। अब घड़ा या तो अणुरूप है या अणुओं का संघात है। यदि घड़ा अणुरूप है तो उसका प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, क्योंकि अणु स्वभावत: इतना सूक्ष्म होता है कि उसका इन्द्रिय अर्थ सन्निकर्ष सम्भव नहीं है। यदि घड़ा अणुओं का संघात है, तो उसका पूर्णतः प्रत्यक्ष होना असम्भव है। हमें घड़े के उसी भाग का प्रत्यक्ष होगा जिस तरफ से उसे देखेंगे। पुन: घड़े के एक भाग का भी प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, क्योंकि घड़े का वह भाग भी अणुरूप होगा।

    यदि घड़े का वह भाग अणुरूप है तो वह इतना सूक्ष्म होगा कि उसका इन्द्रिय सन्निकर्ष सम्भव नहीं हो सकेगा। परिणामस्वरूप उसका ज्ञान सम्भव नहीं हो सकेगा। इस प्रकार विज्ञानवाद की मान्यता है कि यदि बाह्यार्थ के अस्तित्व को स्वीकार भी किया जाए तो उसका ज्ञान सम्भव होगा। अत: बाह्यर्थ की सत्ता में विश्वास के लिए कोई आधार नहीं है।

    यदि बाह्यार्थ के ज्ञान को सम्भव माना भी जाए तो क्षणिकवाद में दोष आता है। क्षणिकवाद के अनुसार, किसी भी वस्तु की सत्ता एक से अधिक क्षण तक नहीं हो सकती, परन्तु किसी वस्तु का ज्ञान तभी हो सकता है जब उसकी सत्ता कम-से-कम दो क्षणों तक हो। प्रथम क्षण वह जिसमें वस्तु का इन्द्रिय सन्निकर्ष होगा और द्वितीय वह क्षण जिसमें वस्तुतः उसका प्रत्यक्ष होगा। इससे क्षणिकवाद में दोष आता है। अत: बाह्यार्थ के लिए कोई प्रमाण नहीं है।

    योगाचार सम्प्रदाय के अनुयायी स्वप्न सादृश्य के आधार पर बाह्यार्थ को असत् सिद्ध करके विज्ञानवाद की स्थापना करते हैं। जिस प्रकार हम स्वप्नावस्था में वस्तुओं को बाहर देखते हैं, यद्यपि वे हमारे मन में होती हैं, वैसे ही जाग्रतावस्था के विषय भी मन में होते हैं, मन के बाहर नहीं। स्वप्नावस्था में व्यक्ति शेर को देखकर घबरा जाता है एवं किसी प्रिय से मिलकर प्रसन्न होता है, परन्तु जैसे ही वह जागता है, बाह्य जगत् में कोई अस्तित्व नहीं होता। इस प्रकार स्वप्नावस्था के विषयों का मन के बाहर कोई अस्तित्व नहीं होता। इसी प्रकार योगाचार सम्प्रदाय के अनुसार हमारे शरीर तथा अन्योन्य पदार्थ जो मन के बाहर प्रतीत होते हैं, वे भी मन के अन्तर्गत ही हैं। इस प्रकार वस्तु जगत् विज्ञान मात्र है।

योगाचार की आलोचना

    विज्ञानवादियों की युक्तियों में विरोधाभास है, चूँकि हमें बाह्य वस्तुओं की उपलब्धि होती है। अत: उनके अनस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जा सकता। शंकर कहते हैं कि जब हमें घट-पट आदि का अनुभव होता है, तो उनके अभाव को अस्वीकार नहीं कर सकते। शंकर के अनुसार, “विज्ञानवादियों की स्थिति उस मनुष्य के समान है जो कहता है कि मैंने भोजन किया है. मैं सन्तुष्ट हूँ, फिर पुन: वह कहता है कि मैंने भोजन नहीं किया है, मैं असन्तुष्ट हूँ। " इस प्रकार बाह्यार्थ को अस्वीकार करना अनुभव के विपरीत है।

    शंकर के अनुसार विज्ञानवादी बाह्य वस्तु का खण्डन करने में ही असंदिग्ध रूप में उसकी सत्ता को स्वीकार कर लेते हैं। विज्ञानवादियों का यह कहना कि हमारे आन्तरिक विज्ञान ही बाह्य वस्तु के समान दिखाई देते हैं, तत्पश्चात् यह स्वीकार कर लेना कि कोई बाह्य वस्तु अवश्य है, जिसके समान हमारे विज्ञान दिखाई देते हैं, विरोधाभासी बात है। शंकर के अनुसार, जाग्रत एवं स्वप्न की तुलना असमंजसपूर्ण है, क्योंकि दोनों में अन्तर है।

    जाग्रत ज्ञान, स्वप्न आदि के ज्ञान के समान नहीं हो सकता, क्योंकि दोनों वैधर्म्य हैं। आलय विज्ञान पर शंकर कहते हैं कि आलय विज्ञान भी क्षणिक होने के कारण वासनाओं का आश्रय नहीं हो सकता। पुन: यदि आलय विज्ञान को स्थायी मान भी लें, तो क्षणिकवाद में दोष आ जाएगा। इस प्रकार विज्ञानवादियों का मत तर्कसंगत नहीं है।

माध्यमिक (शून्यवाद)

     माध्यमिक शून्यवाद. महायान बौद्ध विचारधारा की महत्त्वपूर्ण शाखा है। आचार्य नागार्जुन को शून्यवाद का प्रवर्तक माना जाता है। उसने शून्य को ही एकमात्र तत्त्व घोषित किया, यद्यपि उसने शून्य का विशिष्ट अर्थ दिया। शून्यवाद माध्यमिक दर्शन के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह गौतम के उपदेशों को अक्षरश: मानते हुए परम विधि एवं परम निषेध के बीच के मार्ग को स्वीकार करता है।

     माध्यमिक दर्शन का मानना है कि योगाचार सम्प्रदाय जिन युक्तियों का प्रयोग करके बाह्य वस्तु की सत्ता का निषेध करता है, उन्हीं युक्तियों के आधार पर आत्मा का भी निषेध किया जा सकता है। माध्यमिक कहता है कि यदि हम प्रत्यक्षानुभवों से आगे बढ़कर अनुभूत पदार्थों तक नहीं पहुँच सकते, तो अनुभवों के आधार पर प्रत्यक्ष की सम्पादन आत्मचेतना तक कैसे पहुँच सकते हैं? अत: बाह्य जगत् को विज्ञान की प्रतीति मानने की आवश्यकता नहीं है।

     नागार्जुन ने मध्यमिकशास्त्र में बाह्य सत्ता का प्रतिपादन करने वाली युक्तियों में दोष दिखाकर वस्तु स्वभाव की तार्किक विवेचना की और यह सिद्ध करने की चेष्टा की कि वस्तु सम्बन्धी उत्पत्ति, जाति, गति निरोध आदि गुण वस्तु के स्वरूप नहीं हैं, बल्कि अविद्याजन्य मिथ्या प्रपंचमात्र हैं। यह सम्पूर्ण आनुभविक जगत प्रतीति मात्र एवं अज्ञेय सम्बन्धों का जाल है। नागार्जुन के अनुसार, “किसी का भी अस्तित्व नहीं है, चाहे हम उसे स्वयं से उत्पन्न माने या दूसरे से उत्पन्न माने या दोनों से उत्पन्न मानें या किसी भी कारण से उत्पन्न माने। "

     इस प्रकार माध्यमिक की दृष्टि में उत्पत्ति की धारणा मिथ्या प्रत्यय मात्र है, वस्तुस्वभाव नहीं। चूँकि, बुद्ध का सिद्धान्त किसी भी चीज को अकारण नहीं मानता। अत: सम्पूर्ण जगत भ्रममूलक है। सारा अनुभव भ्रम है। विज्ञान एवं विज्ञान से इतर सभी तत्त्व भ्रम मात्र हैं।

     माध्यमिक दर्शन तत्त्व को शून्य या शून्यता कहता है। शून्य से आशय अभाव या अनस्तित्व से नहीं है। यहाँ शून्यता एक भावात्मक तत्त्व है। कुमारजीव के अनुसार, “प्रत्येक वस्तु का सम्भव होना शून्यता के कारण है और इसके बिना संसार में कुछ भी सम्भव नहीं है। "

    नागार्जुन का कथन है कि मनुष्य व्यवहार में जिन गुणों को वस्तु का स्वरूप समझते हैं, वे सभी हेतु प्रत्ययजन्य हैं। हेतुफल परम्परा के अप्रमाणित होने पर बुद्धि द्वारा वस्तु के पारमार्थिक स्वरूप का निश्चय हो पाना सम्भव नहीं है। अत: 'नि:स्वाभवता' ही वस्तु का पारमार्थिक स्वरूप है। माध्यमिक इसी को शून्य कहते हैं। विज्ञान को शून्य कहने का तात्पर्य यह है कि वह प्रपंचशून्य और बाह्य जगत स्वभाव शून्य है।

    इस प्रकार तत्त्व को शून्य कहने का तात्पर्य इतना ही है कि वस्तु का पारमार्थिक स्वरूप बुद्धि से परे एवं अनिर्वचनीय है। माध्यमिक उन्हीं तत्त्वों को शून्य कहता है, जिनकी व्याख्या नहीं हो सकती। इस प्रकार शून्यवादी दार्शनिक प्रवृत्ति भावात्मक है।

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