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मीमांसा दर्शन का ज्ञान सिद्धान्त

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मीमांसा दर्शन का ज्ञान सिद्धान्त

    मीमांसा दर्शन में ज्ञान सिद्धान्त आत्मा से सम्बन्धित है। इन दार्शनिकों की मान्यता है कि आत्मा अनेक है तथा यह नित्य एवं विभुद्रव्य है। मीमांसा दर्शन में ज्ञान के सम्बन्ध में मुख्यत: दो सिद्धान्त प्रचलित हैं-

  1. त्रिपुटि प्रत्यक्षवाद तथा
  2. ज्ञाततावाद।

जिनका प्रतिपादन क्रमश: प्रभाकर तथा कुमारिल भट्ट द्वारा किया गया।

त्रिपुटि-संवित (प्रभाकर)

   वस्तुत: तीन (ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय) का समूह 'त्रिपुटि' कहलाता है, जबकि संवित का अर्थ चेतना या समझ है। प्रभाकर के अनुसार ज्ञान के तीन आयाम हैं-ज्ञाता, ज्ञेय तथा ज्ञान। प्रत्येक ज्ञान की अभिव्यक्ति में इस त्रिपुटि का प्रत्यक्ष होता है, इसीलिए प्रभाकर का ज्ञान विषयक मत 'त्रिपुटि प्रत्यक्षवाद' कहलाता है।

    प्रभाकर के अनुसार ज्ञान स्वप्रकाश है, उसे अपनी अभिव्यक्ति के लिए किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। अत: स्पष्ट है कि ज्ञान की उत्पत्ति तथा उसकी प्रामाणिकता के सन्दर्भ में प्रभाकर परत:प्रामाण्यवाद को स्वीकार न करके स्वत:प्रामाण्यवाद को स्वीकार करते हैं। इनकी मान्यता है कि ज्ञान के प्रामाण्य को सिद्ध करने के लिए अन्य ज्ञान की कल्पना से अनावस्था दोष पैदा होता है। ज्ञान स्वप्रकाश तो है, किन्तु नित्य नहीं है, क्योंकि ज्ञान आत्मा का आगन्तुक गुण है। अत: यह उत्पत्ति-विनाश धर्मा है। विषय सम्पर्क से आत्मा में ज्ञान उत्पन्न होता है, चूँकि ज्ञान स्वप्रकाश है इसलिए वह स्वयं को प्रकाशित करने के साथ ही ज्ञेय (विषय) एवं ज्ञाता (आत्मा) को भी प्रकाशित करता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक ज्ञान में ज्ञाता, ज्ञेय तथा ज्ञान की त्रिपुटि का प्रत्यक्ष होता है। इसी प्रकार दीपक का प्रकाश घटपटादि पदार्थ को ज्ञेय के रूप में, स्वयं को ज्ञान के रूप में और अपने आश्रयभूत पात्र को ज्ञाता के रूप में प्रकाशित करता है। ज्ञान स्वप्रकाश है, किन्तु आत्मा स्वप्रकाश नहीं है। आत्मा पदार्थ के समान जड़द्रव्य है, जो अपनी अभिव्यक्ति के लिए ज्ञान पर निर्भर है। आत्मा ज्ञान का आश्रय है, किन्तु अपनी अभिव्यक्ति के लिए स्वयं ज्ञान पर आश्रित है।

प्रभाकर मत की आलोचना

प्रभाकर मत की आलोचना निम्न प्रकार की गई है-

    प्रभाकर का यह कथन सही है कि ज्ञान स्वप्रकाश है, आत्मा ज्ञाता है और ज्ञाता कभी ज्ञेय नहीं हो सकता, किन्तु ज्ञान को ज्ञाता का स्वरूप न मानकर आगन्तुक धर्म मानना एक प्रकार का अज्ञान है।

    आत्मा को स्वप्रकाश न मानना तथा उसे एक जड़द्रव्य के रूप में स्वीकार करना, आत्मा के स्वरूप का अज्ञान है।

    प्रभाकर मूलतः वस्तुवादी हैं। इसलिए वे आत्मा की अनेकता में विश्वास रखते हैं, किन्तु आत्मा तत्त्वत: व स्वरूपत: अद्वैत तत्त्व है, क्योंकि आत्मा व ब्रह्म में लेशमात्र का भेद नहीं है।

ज्ञाततावाद या ज्ञातता (कुमारिल भट्ट)

    कुमारिल का ज्ञान विषयक मत 'ज्ञाततावाद' कहलाता है। कुमारिल का मत है कि ज्ञान सर्वप्रकाश नहीं होता है। ज्ञान न तो स्वयं प्रकाशित होता है और न ही आत्मा को ज्ञाता के रूप में प्रकाशित करता है। ज्ञान केवल ज्ञेय (विषय) को ही प्रकाशित करता है। कुमारिल के अनुसार ज्ञान किसी अन्य ज्ञान द्वारा प्रकाशित नहीं होता। अतः स्पष्ट है कि ज्ञान के प्रामाण्य के सन्दर्भ में यहाँ परत:प्रामाण्यवाद को अस्वीकार किया गया है। प्रश्न यह उठता है कि आत्मा तो ज्ञाता है फिर ऐसी स्थिति में आत्मा का ज्ञान कैसे प्राप्त होता है। इस सन्दर्भ में कुमारिल का मत है कि आत्मा स्वयं अपने ही द्वारा अपना ज्ञान प्राप्त करती है तथा इस स्थिति में आत्मा स्वयं ज्ञाता एवं ज्ञेय दोनों होती है।

    कुमारिल के समक्ष समस्या यह है कि जब ज्ञान का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता अर्थात् ज्ञान प्राप्त होते समय उसकी कोई अनुभूति नहीं होती तो फिर हमें यह कैसे पता चलता है कि ज्ञान प्राप्त हो गया? इस सन्दर्भ में कुमारिल कहते हैं कि ज्ञातता के आधार पर ज्ञान का अनुमान कर लिया जाता है। कुमारिल के अनुसार, किसी पदार्थ का ज्ञान प्राप्त होने पर उस धर्म में ज्ञातता नामक धर्म का उदय होता है। यहाँ ज्ञातता से तात्पर्य है कि विषय ज्ञाता द्वारा ज्ञात हो चुका है, इसकी प्रतीति होती है। ' इस ज्ञातता के आधार पर यह अनुमान कर लिया जाता है कि आत्मा को विषय का ज्ञान प्राप्त हो गया। उदाहरणार्थ जिस प्रकार पकाने पर चावल में 'पकता' नामक एक नया गुण उत्पन्न हो जाता है और उस गुण को जानकर हम यह ज्ञान प्राप्त करते हैं कि यह पकाया गया है। यद्यपि पकते समय उसे नहीं देखा गया था, ठीक इसी प्रकार जब कोई विषय ज्ञान में प्रकाशित होता है, तो हमें यह पता चलता है कि पहले यह विषय अज्ञात था, अब ज्ञात हो गया। इस विषय में जो यह परिवर्तन आया, जिसने इसे अज्ञात से ज्ञात की कोटि में ला दिया, इसमें किसी नए गुण की उत्पत्ति द्वारा ही सम्भव है। विषय में उत्पन्न इस गुण को ही कुमारिल 'ज्ञातता' का गुण कहते हैं। अत: स्पष्ट है कि पदार्थ के ज्ञात होने पर उसकी ज्ञातता के आधार पर ज्ञान का अनुमान किया जाता है। कुमारिल के अनुसार ज्ञान आत्मा का अनिवार्य गुण (स्थिर गुण) नहीं बल्कि आगन्तुक गुण है।

कुमारिल के मत की आलोचना

कुमारिल का मत कई दोषों से ग्रस्त है। शंकर ने ज्ञाततावाद पर कई आक्षेप लगाए हैं, जो निम्न हैं-

    शंकर के अनुसार, ज्ञान आत्मा का आगन्तुक गुण नहीं है, बल्कि यह आत्मा का अनिवार्य लक्षण है। ज्ञान को आत्मा का आगन्तुक गुण मानना आत्मा के स्वरूप का अज्ञान है।

    शंकर के अनुसार, यदि ज्ञान को प्रत्यक्ष अनुभूति का विषय न माना जाए तो ऐसी स्थिति में ज्ञान के स्वरूप का निर्धारण नहीं किया जा सकता। ज्ञान के स्वरूप का निर्धारण करने के लिए हमें यह स्वीकार करना होगा कि ज्ञान साक्षात् प्रत्यक्ष से प्राप्त होता है, किसी ज्ञातता नामक गुण की उत्पत्ति से नहीं।

    शंकर के अनुसार, आत्मा जड़ बोधक नहीं है। आत्मा विशुद्ध ज्ञाता तथा चेतन है। वस्तुवादी होने के कारण कुमारिल आत्मा के स्वरूप की सही व्याख्या नहीं कर सके।

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