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मीमांसा दर्शन में जाति का स्वरूप

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मीमांसा दर्शन में जाति का स्वरूप 

मीमांसा दर्शन में जाति का स्वरूप 

जाति

     जाति गौणी वृत्ति के मान्य छ: निमित्तों में से एक है। शब्दार्थ जाति है या व्यक्ति इस सम्बन्ध में भी मीमांसा दर्शन का अन्य दर्शनों से मतभेद है। उदाहरण के लिए—'गाय' एक शब्द है। इसके उच्चारण से हमें पहले गोत्व जाति का बोध होता है और अन्त में व्यक्ति विशेष गाय का। इसलिए जाति ही शब्द का अभिप्रेत अर्थ है, व्यक्ति नहीं। क्योंकि जाति का अभिधान किए बिना व्यक्ति का अभिधान व्यावहारिक दृष्टि से उचित नहीं है। जाति सामान्य के बिना व्यक्ति विशेष का ग्रहण हो ही नहीं सकता है। अत: शब्दार्थ जाति है, व्यक्ति नहीं। 

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