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सांख्य दर्शन में पुरुष व प्रकृति का स्वरूप व सम्बन्ध

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सांख्य दर्शन में पुरुष व प्रकृति का स्वरूप व सम्बन्ध

सांख्य दर्शन में पुरुष व प्रकृति का स्वरूप व सम्बन्ध

    सांख्य दर्शन द्वैतवादी दर्शन है। इसके अनुसार पुरुष और प्रकृति संसार के दो परम तत्त्व हैं। इस द्वैतवादी दर्शन में पुरुष का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ चेतना को पुरुष कहा गया है तथा इसे निष्क्रिय, ज्ञानस्वरूप, अकर्ताअभोक्ता, सभी प्रकार के अनुभवों से रहित, निर्लिप्त दृष्टा तथा नित्य मुक्त बताया गया है। पुरुष के विपरीत प्रकृति को निरवयव, शाश्वत, अदृश्य, अचेतन, किन्तु सक्रिय बताया गया है।

     सांख्य दार्शनिकों के अनुसार अनादि अज्ञान के कारण पुरुष को अपने उपरोक्त स्वरूप का ज्ञान नहीं रहता। अत: यह अपने आप को शरीर, मन, इन्द्रिय तथा बुद्धि आदि समझता है तथा अपने आप को कर्ता, भोक्ता तथा अनुभवकर्ता आदि मानता है। ऐसे पुरुष को ही सोपाधिक पुरुष की संज्ञा दी गई है। यह पुरुष ही बन्धन में रहता है, जब तक कि उसे विवेक ज्ञान नहीं हो जाता है।

    सांख्य दार्शनिकों के अनुसार, पुरुष और प्रकृति के सहयोग से सम्पूर्ण विश्व निर्मित होता है। उल्लेखनीय है कि पुरुष और प्रकृति का सम्बन्ध दो भौतिक पदार्थों की तरह नहीं है। यह एक अद्भुत सम्बन्ध है जो एक-दूसरे को प्रभावित करता है। जिस प्रकार विचार का प्रभाव शरीर पर पड़ता है, उसी प्रकार पुरुष का प्रभाव प्रकृति पर पड़ता है। जब तक पुरुष का प्रकृति से संयोग नहीं होता, तब तक प्रकृति में साम्यावस्था रहती है। इस अवस्था में प्रकृति से कुछ भी उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि गुण आपस में नहीं मिलते अर्थात् सत् सत् में, रज रज् में तथा तम् तम् में ही परिवर्तित होता रहता है। इस प्रकार के परिवर्तन को स्वरूप परिवर्तन कहा जाता है। वास्तव में, यह प्रलय की अवस्था है, किन्तु जैसे ही पुरुष का प्रकृति से सम्बन्ध स्थापित होता है, गुण क्षोभ होता है अर्थात् गुण आपस में मिलने लगते हैं, फलत: सृष्टि प्रारम्भ हो जाती है। प्रकृति की यह अवस्था विषमावस्था कहलाती है तथा प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को विरूप परिवर्तन की संज्ञा दी जाती है। प्रश्न यह है कि यदि प्रकृति सक्रिय तथा पुरुष निष्क्रिय है, तो इन दोनों के बीच सम्बन्ध कैसे स्थापित हो सकता है? क्योंकि सम्बन्ध तभी स्थापित हो सकता है, जब दोनों सक्रिय हों। इस समस्या का समाधान सांख्य दार्शनिक कुछ उपमाओं के द्वारा करते हैं।

    सांख्य दार्शनिक कहते हैं कि जिस प्रकार चुम्बक सन्निधि से लोहा चलायमान होता है, उसी प्रकार पुरुष की सन्निधि मात्र से प्रकृति क्रियाशील हो जाती है। इस उपमा के अतिरिक्त पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध को अन्धे और लंगड़े के सहयोग की उपमा दी गई है। एक कथानक के अनुसार जंगल में आग लग जाने पर जिस प्रकार अन्धे और लंगडे ने एक-दूसरे के सहयोग से जंगल को पार कर लिया था, उसा प्रकार का संयोग परुष तथा प्रकति के बीच स्थापित होता है। अचेतन प्रकति चेतन पुरुष के प्रयोजन को प्रमाणित करने के लिए जगत् का विकास करती है। प्रकृति का विकास प्रयोजनात्मक है। प्रकृति अचेतन होने के बाद भी प्रयोजन संचालित होती है, इसलिए सांख्य का सिद्धान्त अचेतन प्रयोजनवाद है।

    जिस प्रकार गाय के स्तन से अचेतन दूध बछड़े के पालन-पोषण के लिए प्रवाहित होता है या जिस प्रकार अचेतन वृक्ष मनुष्यों के भोग के लिए फल का निर्माण करता है, उसी प्रकार अचेतन प्रकृति पुरुष लाभ के लिए सृष्टि करती है। सृष्टि का उद्देश्य पुरुषों के भोग में सहायता प्रदान करना है। पुरुष के मोक्ष के निमित्त प्रकृति जगत् का प्रलय करती है। पुरुष को प्रकृति से अपने पार्थक्य का ज्ञान होने पर पुरुष को मोक्ष की प्राप्ति होती है। चूंकि सांख्य दर्शन में पुरुष को अनेक माना गया है, अत: इनका मत है कि कुछ पुरुषों के मोक्ष प्राप्त कर लेने के बाद भी अन्य पुरुषों के भोग हेतु जगत् की सृष्टि होती रहती है। सक्रिय रहना प्रकृति का स्वभाव है। किसी पुरुष के मोक्ष प्राप्ति के साथ ही उसके सन्दर्भ में प्रकृति की क्रिया रुक जाती है तथा प्रकृति में विरूप परिवर्तन के स्थान पर स्वरूप परिवर्तन प्रारम्भ हो जाते हैं। यह साम्यावस्था है, जिसे प्रलय भी कहा जाता है।

    सांख्य दार्शनिकों के अनुसार, जिस प्रकार दर्शकों के मनोरंजन के बाद नर्तकी नृत्य करना बन्द कर देती है, उसी प्रकार पुरुष के विवेक ज्ञान के पश्चात् प्रकृति सृष्टि से अलग हो जाती है। यहाँ विवेक ज्ञान से आशय है कि पुरुष को यह ज्ञात हो जाता है कि मैं शरीर, मन, इन्द्रिय आदि नहीं हूँ, मैं कर्ता, भोक्ता तथा अनुभवकर्ता नहीं हूँ, मैं तो नित्य मुक्त, ज्ञान स्वरूप, त्रिगुणातीत, निर्लिप्त दृष्टा मात्र हूँ।

प्रकृति एवं पुरुष के मध्य भेद

प्रकृति                  

पुरुष

त्रिगुणात्मक       

त्रिगुणातीत

अचेतन            

चेतन

सामान्य           

विशेष

अविवेकी         

विवेकी

दिखने वाली      

दृष्टा

परिवर्तनशील   

अपरिवर्तनशील

सक्रिय            

निष्क्रिय

लिंग               

अलिंग

सावयव          

निरवयव

अंशव्यापी       

सर्वव्यापी

पुरुष प्रकृति के स्वरूप की आलोचना

    सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति के बीच जो सम्बन्ध स्थापित किया गया है, उसके विरुद्ध कुछ दार्शनिक समस्याएँ हैं। सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करने की कुछ उपमाओं का प्रयोग किया गया है, जो विरोधपूर्ण प्रतीत होती हैं।

    पुरुष और प्रकृति का सम्बन्ध अन्धे और लंगड़े की तरह नहीं है। अन्धा और लंगड़ा दोनों ही चेतन और क्रियाशील हैं, जबकि पुरुष और प्रकृति में से केवल प्रकृति को ही सक्रिय बताया गया है। अन्धे और लंगड़े दोनों का उद्देश्य एक ही है, जंगल पार करना, परन्तु पुरुष और प्रकृति में से केवल पुरुष का उद्देश्य ही मोक्ष प्राप्त करना है।

    लोहे और चुम्बक का उदाहरण भी पुरुष और प्रकृति के बीच सम्बन्ध की व्याख्या करने में असफल है। लोहा और चुम्बक दोनों ही निर्जीव तथा अचेतन हैं. परन्त परुष और प्रकृति में से केवल प्रकृति ही अचेतन है. पुरुष नहीं। चुम्बक लोहे को तभी आकृष्ट करता है, जब कोई लोहे को चुम्बक के पास रखे। इसी प्रकार पुरुष तभी प्रकृति को प्रभावित कर सकता है, जब कोई सत् अन्य पुरुष को प्रकृति के सम्मुख उपस्थित करे, किन्त सांख्य दार्शनिक पुरुष और प्रकृति को छोड़कर किसी अन्य सत्ता को मौलिक नहीं मानते। अत: पुरुष और प्रकृति के बीच सम्बन्ध सम्भव नहीं है।

    सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध द्वारा विकास को प्रयोजनात्मक बताने का प्रयास किया गया है, किन्तु यदि आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रयास असफल दिखाई देता है, क्योंकि अचेतन होने के कारण प्रकृति का प्रयोजन मानना तर्कसंगत नहीं जान पड़ता।

    प्रयोजन की बात केवल चेतन सत्ता के सन्दर्भ में ही की जा सकती है। प्रकृति को प्रयोजनपूर्ण सिद्ध करने के लिए सांख्य ने कुछ उपमाओं का प्रयोग किया है जो उपयुक्त प्रतीत नहीं होती; जैसेसांख्य दर्शन में कहा गया है कि जिस प्रकार अचेतन दूध गाय के स्तन से बछड़े के लिए बहता है, उसी प्रकार प्रकृति 'पुरुष' के भोग और मोक्ष के लिए सृष्टि करती है, परन्तु सांख्य यहाँ भूल जाते हैं कि गाय से दूध मातृत्व प्रेम व वात्सल्य से रचित होकर बहता है तथा जो गाय दूध दे रही है, वह चेतन है न कि अचेतन। अत: यह उपमा अचेतन प्रयोजनवाद की पुष्टि करने में सफल नहीं हो पाती है। अचेतन प्रयोजनवाद के सिलसिले में यह कहा जाता है कि अचेतन प्रकृति क्रिया करती है और पुरुष भोग करता है। यदि इसे माना जाए तो कर्म-नियम का खण्डन होता है, क्योंकि कर्म तो प्रकृति करती है, किन्तु कर्मों का फल पुरुष को भोगना पड़ता है।

    सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति को स्वतन्त्र तथा निरपेक्ष माना गया है। यदि यह सत्य है, तो इनके बीच कभी कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकता। शंकर के अनुसार, उदासीन पुरुष और अचेतन प्रकृति का संयोग कराने में कोई भी तीसरा तत्त्व असमर्थ है।

    इस प्रकार, पुरुष और प्रकृति का संयोग काल्पनिक प्रतीत होता है। यदि पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध का उद्देश्य भोग कहा जाए, तो प्रलय असम्भव हो जाएगी। यदि इस सम्बन्ध का उद्देश्य मोक्ष माना जाए, तो सृष्टि असम्भव हो जाएगी। पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध का उद्देश्य भोग और मोक्ष दोनों में से किसी को नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह व्याघात जान पड़ता है।

    अतः स्पष्ट है कि सांख्य दर्शन पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध की व्याख्या करने में असफल रहा है। इस असमर्थता का कारण सांख्य का द्वैतवाद है। सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति को स्वतन्त्र तथा निरपेक्ष कहा गया। यदि पुरुष और प्रकृति एक ही तत्त्व के दो रूप माने जाते, तो यह कठिनाई उत्पन्न ही नहीं होने पाती।

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