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स्वामी विवेकानन्द ( Swami Vivekananda )

श्री अरविन्द घोष ( Sri Aurobindo )

मुहम्मद इकबाल ( Muhammad Iqbal )

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के सी भट्टाचार्य ( Krishna Chandra Bhattacharya )

सर्वपल्ली राधाकृष्णन ( Sarvepalli Radhakrishnan )

जिद्दू कृष्णमूर्ति ( Jiddu Krishnamurti )

महात्मा गाँधी ( Mahatma Gandhi )

भीमराव आम्बेडकर ( B. R. Ambedkar )

दीन दयाल उपाध्याय ( Deendayal Upadhyaya )

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ज्योतिबा फुले ( Jyotirao Phule )

मानवेन्द्र नाथ राय ( M. N. Roy )

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स्वामी दयानन्द सरस्वती ( Dayananda Saraswati )


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न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice न्याय दर्शन में प्रमाण के सिद्धान्त // Principles of Proof in Philosophy of Justice प्रमाण विचार न्याय दर्शन में 16 पदार्थों के तत्त्वज्ञान द्वारा मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है ।  'प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्क निर्णयवादजल्पवितंडाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसाधिगमः। (न्यायसूत्र, 1.1.1)  अर्थात प्रमाणादि षोडश पदार्थों के तत्त्वज्ञान से अपवर्ग (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।         प्रायः सभी भारतीय दर्शन तत्त्व विचार करने के पूर्व तत्त्व को जानने के साधन पर विचार करते हैं। ये साधन ही प्रमाण कहे जाते हैं। प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) की प्राप्ति के साधन को प्रमाण कहते हैं 'प्रमीयते अनेन इति प्रमाणम्, तथा 'प्रमाकरणं प्रमाणम्’। प्रमाण के चार प्रकार हैं -  1. प्रत्यक्ष प्रमाण  महर्षि गौतम ने न्यायसूत्र में कहा है –  इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्।  अव्यपदेशमव्यभिचारिव्यवसायात्मक प्रत्यक्षम् ।। (न्यायसूत्र) ...

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