Wednesday, May 18, 2022

जे कृष्णमूर्ति का आत्मा-विश्लेषण

जे कृष्णमूर्ति का आत्मा-विश्लेषण 

जे कृष्णमूर्ति का आत्मा-विश्लेषण 

    कृष्णमूर्ति के अनुसार, होने का अर्थ ही है सम्बन्धित होना। सम्बन्धित जीवन नाम की कोई चीज नहीं है। यह उचित सम्बन्ध का अभाव है जो द्वन्द्वों, कष्ट और कलह को जन्म देता है। क्रान्ति के लिए व्यक्ति को स्वयं को समझना होगा। कृष्णमूर्ति के अनुसार, आत्म विश्लेषण से अभिप्राय अपने अन्दर देखना, अपना परीक्षण करना है। व्यक्ति अपना आत्मविश्लेषण इसलिए करता है, ताकि वह बेहतर हो सके। हम कुछ बनने के लिए आत्मविश्लेषण करते हैं, अन्यथा हम इसके झंझट में नहीं पड़ते। कृष्णमूर्ति के अनुसार, यदि जो आप हैं उससे कुछ भिन्न होने की, परिवर्तन की, रूपान्तरण की आकांक्षा आप में न हो, तो आप अपना परीक्षण नहीं करेंगे। आत्म-विश्लेषण की प्रक्रिया हमें विमुक्त नहीं करती, क्योंकि वह तो 'जो है' उसे कुछ ऐसी चीज में जो वह नहीं है, रूपान्तरित करने की प्रक्रिया है। स्पष्ट है जब हम आत्म-विश्लेषण करते हैं, जब उस विशेष क्रिया में संलग्न होते हैं, तो ठीक ऐसा ही होता है। आत्म-विश्लेषण में सदा एक संचयी प्रक्रिया निहित है। किसी स्थिति को बदलने के उद्देश्य से 'मैं' उसका निरीक्षण करता हूँ। अतः उसमें सदा एक द्वैतपूर्ण द्वन्द्व, फलस्वरूप कुण्ठा, नैराश्य की प्रक्रिया बनी रहती है। इससे छुटकारा कभी नहीं मिलता। कृष्णमूर्ति के अनुसार, आत्म-निरीक्षण जोकि आत्म सुधार का, अहंविस्तार का एक रूप है, सत्य तक कभी नहीं ले जा सकता, क्योंकि यह हमेशा अपने आप को सीमा में सीमित करने की प्रक्रिया है।

-------------


जे कृष्णमूर्ति का ज्ञाता से स्वतंत्रता विचार

जे कृष्णमूर्ति का ज्ञाता से स्वतंत्रता विचार 

जे कृष्णमूर्ति का ज्ञाता से स्वतंत्रता विचार  

    कृष्णमूर्ति की मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति के मन में अज्ञात को जानने की इच्छा होती है, परन्तु क्या हमारे भीतर अज्ञात को जानने की प्रेरणा है? यदि हम उसे जानते नहीं, तो पता कैसे लगा सकते हैं। यदि हमारा मन अज्ञात को नहीं खोज सकता, तो उसे जानेगा कैसे? कृष्णमूर्ति के अनुसार, हमारी समस्या यह नहीं है कि हमें अज्ञात की खोज की ओर ले जाने वाली कौन-सी भीतरी प्रेरणा है। वह तो काफी स्पष्ट है। अधिक सुरक्षित, अधिक स्थायी, अधिक प्रतिष्ठित, पीड़ा से, विभ्रम से बचने की हमारी अपनी आकांक्षा ही वह प्रेरणा है, यह बिल्कुल स्पष्ट है। जब इस प्रकार की प्रेरणा, इस प्रकार की ललक होती है, तब हम बुद्ध में, ईसा में, किसी राजनीतिक नारेबाजी में अथवा इसी प्रकार की किसी और बात में एक अद्भुत पलायन, एक अद्भुत शरण पा लेंगे। लेकिन वह यथार्थ नहीं है। अब अविज्ञेय नहीं है, अज्ञात नहीं है। इसलिए अज्ञात के लिए व्यग्रता का अन्त होना जरूरी है। मन को स्वयं को ज्ञात के रूप समझ लेना जरूरी है, क्योंकि वह सिर्फ उसे ही जानता है, जिसे हम नहीं जानते हैं, उसके बारे में हम सोच भी नहीं सकते। जो ज्ञात है, उसी को हम सोच सकते हैं। हमारी कठिनाई यही है कि मन ज्ञात में गति न करता रहे। ऐसा तभी हो सकता है, जब मन स्वयं को तथा इस बात को समझ लेता है कि उसकी सारी गतिविधियाँ अतीत से आ रही हैं, जो वर्तमान के माध्यम से भविष्य में प्रक्षिप्त हो रही हैं। वह ज्ञात की ही एक सतत् गति है। उस गतिविधि का अन्त तभी हो सकता है, जब उसकी प्रतिक्रिया की कार्यविधि को समझ लेता है। केवल सतही माँग की नहीं, बल्कि भीतरी माँग की भी तो उलझन खत्म हो जाती है। हम ईश्वर को खोज रहे यह सोच केवल भ्रम है। जो प्रकाशवान खोजना नहीं पड़ता। हम अन्धकार के माध्यम से प्रकाश को नहीं पा सकते, बल्कि हमें अन्धकार निर्मित करने वाली बाधाओं को हटाना होगा, ताकि हम प्रकाश को देख सकें। हमारे भीतर से उलझनें, विरोधाभास एवं मूर्खता दूर होने पर पूजा होती ही है। इसकी कोशिश नहीं करनी पड़ती। मूर्ख व्यक्ति यदि प्रज्ञावान बनने का प्रयास करे, तो वह ऐसा नहीं कर पाता। मूर्खता है क्या, इसके लिए उसे समग्रता से पड़ताल करनी होगी। मूर्खता का अन्त होते ही प्रज्ञा विद्यमान होती है।

-------------


जे कृष्णमूर्ति का विचार प्रत्यय

जे कृष्णमूर्ति का विचार प्रत्यय 

जे कृष्णमूर्ति का विचार प्रत्यय 

    कृष्णमूर्ति के विचारों, जो गहरे ध्यान, श्रेष्ठ ज्ञान एवं उच्च व्यवहार की उपज हैं, ने दुनिया के समस्त दार्शनिकों, धार्मिकों एवं मनोवैज्ञानिकों को प्रभावित किया। वे कहते थे कि आपने जितनी भी परम्परा, देश एवं काल से जानी है, उससे मुक्त होकर ही आप सच्चे अर्थों में मानव बन पाएंगे। जीवन का परिवर्तन मात्र इसी बोध में निहित है कि आप स्वतन्त्र रूप से सोचते हैं, कि नहीं। आप अपनी सोच पर ध्यान देते हैं, या नहीं। उनके अनुसार विश्व को बेहतर बनाने के लिए यथार्थवादी एवं स्पष्ट मार्ग पर चलना चाहिए। जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं - आपके भीतर कुछ भी नहीं होना चाहिए, तब आप एक साफ एवं स्पष्ट आकाश देखने के लिए तैयार हो जाते हैं। आप धरती का भाग नहीं आप स्वयं आकाश हैं। यदि आप कुछ भी हैं, तो फिर आप कुछ नहीं। उन्होंने 'ऑर्डर ऑफ दि स्टार' को भंग करते हुए कहा कि अब से कृपा करके याद रखें कि मेरा कोई शिष्य नहीं है, क्योंकि गुरु तो सब को दबाता है। सच तो स्वयं तुम्हारे भीतर है। सच को ढूंढने के लिए मनुष्य को सभी बन्धनों से स्वतन्त्र होना आवश्यक है। जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं कि हम रूढ़ियों के दास हैं। भले ही हम खुद को आधुनिक समझ बैठे हैं, मान लें कि हम स्वतन्त्र हो गए, परन्तु गहराई से देखें, हम रूढ़िवादी ही हैं। इसमें कोई संशय नहीं है, क्योंकि छवि-रचना के खेल को आपने स्वीकार किया है और परस्पर सम्बन्धों को इसी के आधार पर स्थापित करते हैं। यह बात उतनी ही पुरातन है, जितनी कि ये पहाड़ियाँ। यह हमारी एक रीति बन गई है। हम इसे अपनाते हैं, इसी में जीते हैं और इसी से एक-दूसरे को यातनाएँ देते हैं, तो क्या इस रीति को रोका जा सकता है? जे. कृष्णमूर्ति ने वर्ष 1979 में प्रकाशित हुई अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'मेडिटेशन' में ध्यान के सन्दर्भ में अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने लिखा है कि ध्यान का अर्थ विचार का अन्त हो जाना है तथा एक भिन्न आयाम का प्रकट होना है जो समय से परे है। ध्यानपूर्ण मन शान्त होता है। यह मौन विचार की कल्पना से परे है। यह मौन किसी निस्तब्ध संध्या की नीरवता भी नहीं है। विचार जब अपने सारे अनुभवों, शब्दों और प्रतिभाओं सहित पूर्णतः विदा हो जाता है, तभी इस मौन का जन्म होता है। यह ध्यानपूर्ण मन ही धार्मिक मन है। किसी चीज को सहज रूप से जैसी वह है, वैसी ही देखना, यह संसार में सर्वाधिक कठिन चीजों में से एक है, क्योंकि हमारा दिल व दिमाग बहुत ही जटिल है और हमने सहजता का गुण खो दिया है। धार्मिक मन प्रेम का विस्फोटक है। यह प्रेम किसी भी अलगाव को नहीं जानता। यह न एक है न अनेक, अपितु यह प्रेम की अवस्था है, जिसमें सारा विभाजन समाप्त हो चुका होता है। सौन्दर्य की तरह उसे भी शब्दों के द्वारा मापा नहीं जा सकता। इस मौन से ही एक ध्यानपूर्ण मन का समस्त क्रियाकलाप जन्म लेता है। कृष्णमूर्ति ने सत्य को एक 'मार्गरहित भूमि' बताया है और यह भी कहा है कि किसी भी औपचारिक धर्म, सम्प्रदाय एवं दर्शन के माध्यम से इस तक नहीं पहुंचा जा सकता।

    जे. कृष्णमूर्ति ने शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कहा है कि शिक्षा का सबसे बड़ा कार्य एक ऐसे समग्र व्यक्ति का विकास है जो जीवन की समग्रता को पहचान सके। वे विचार-विमर्श एवं वार्ताओं द्वारा अपने विचारों को लोगों तक पहुँचाते थे, क्योंकि मानव मूल के मूलभूत परिवर्तनों से तथा एक नवीन संस्कृति के सृजन से जो केन्द्रीभूत है, उसके सम्प्रेषण के लिए शिक्षा को कृष्णमूर्ति प्राथमिक महत्त्व देते थे। अनुशासन के विषय में वे कहते थे कि बाह्य अनुशासन मन को मूर्ख बनाता है। यह आप में अनुकूलता और नकल करने की प्रवृत्ति लाता है, परन्तु यदि आप विचारों के माध्यम से स्वयं को अनुशासित रख सकते हो, तो इससे कुशल व्यवस्था आती है। जहाँ व्यवस्था होती है, वहाँ स्वतन्त्रता सदैव रहती है। यदि आप ऐसा करने में स्वतन्त्र नहीं हैं, तो आप व्यवस्था नहीं कर सकते। व्यवस्था ही अनुशासन है। कृष्णमूर्ति अपने शैक्षिक विचारों के माध्यमों से शिक्षक एवं शिक्षार्थी को यह उत्तरदायित्व सौंपते हैं कि वे एक अच्छे समाज का निर्माण करें, जिसमें सभी लोग शान्ति, सुरक्षा एवं बिना किसी हिंसा के प्रसन्नतापूर्वक जी सकें, क्योंकि आज के विद्यार्थी ही कल के भविष्य हैं।

--------------


जिद्दू कृष्णमूर्ति ( Jiddu Krishnamurti )

जिद्दू कृष्णमूर्ति ( Jiddu Krishnamurti )

जिद्दू कृष्णमूर्ति ( Jiddu Krishnamurti ) 

    जिद्दू कृष्णमूर्ति (12 मई 1895 – 17 फरवरी, 1983) दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विषयों के लेखक एवं प्रवचनकार थे। वे मानसिक क्रान्ति (psychological revolution), मस्तिष्क की प्रकृति, ध्यान, मानवी सम्बन्ध, समाज में सकारात्मक परिवर्तन कैसे लायें आदि विषयों के विशेषज्ञ थे। वे सदा इस बात पर जोर देते थे कि प्रत्येक मानव को मानसिक क्रान्ति की जरूरत है और उनका मत था कि इस तरह की क्रान्ति किन्हीं वाह्य कारक से सम्भव नहीं है चाहे वह धार्मिक, राजनैतिक या सामाजिक कुछ भी हो।

जिद्दू कृष्णमूर्ति ( Jiddu Krishnamurti ) की रचनायें

कृष्णामूर्ति एक एैसे दाशर्निक हैं, जिन्होंने आत्मज्ञान पर विशेष बल दिया। हिन्दी भाषा में उनके अनुवादित मुख्य रचनायें हैं-

Ø  शिक्षा और संवाद

Ø  शिक्षा और जीवन का तात्पर्य

Ø  शिक्षा केन्द्रों के नाम पत्र

Ø  सीखने की कला

Ø  ध्यान

Ø  विज्ञान एवं सृजनशीलता

Ø  स्कूलों के नाम पत्र

Ø  परम्परा जिसने अपनी आत्मा खो दी

Ø  प्रेम

Ø  ध्यान में मन

जिद्दू कृष्णमूर्ति ( Jiddu Krishnamurti ) के दार्शनिक विचार 


जे कृष्णमूर्ति का विचार प्रत्यय



राधाकृष्णन का जीवन के प्रति हिन्दू दृष्टिकोण

राधाकृष्णन का जीवन के प्रति हिन्दू दृष्टिकोण 

राधाकृष्णन का जीवन के प्रति हिन्दू दृष्टिकोण  

    राधाकृष्णन एक प्रत्ययवादी दार्शनिक है तथा उनके दर्शन पर शंकर के अद्वैतवाद का प्रभाव था। इनके दर्शन में नव हिन्दू धर्म का प्रतिपादन हुआ है। उन्होंने जीवन एवं जगत की सत्ता का प्रतिपादन किया। इनके अनुसार हिन्दू धर्म शुद्ध अध्यात्मवाद होते हुए भी जीवन एवं जगत की सत्यता का उच्च स्तर का उद्घोष करता है। हिन्दू धर्म तो धर्म से ज्यादा एक जीवन का मार्ग है। विश्व के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मानव ही ऐसा प्राणी है, जो इस लोक में पाप और पुण्य दोनों कर्म भोग सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। कर्म ही जीवन का प्रधान अंग होता है। इसके द्वारा जीवन को मजबूत बनाया जाता है और इसी आधार पर मानव अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति का प्रयास करता है। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कर्म को ही प्रधान माना जाता है। पुरुषार्थों के साधन के लिए सम्पूर्ण जीवन को कई भागों में विभाजित किया गया है जिसे आश्रम कहा जाता है। आश्रमों में विभक्त सम्पूर्ण जीवन कर्मवाद के अन्दर आवृत माना गया है। भारतीय जीवन में पुनर्जन्मवाद प्रमुख आधार है।

------------

राधाकृष्णन की सार्वभौमिक धर्म की संकल्पना

राधाकृष्णन की सार्वभौमिक धर्म की संकल्पना 

राधाकृष्णन की सार्वभौमिक धर्म की संकल्पना 

    राधाकृष्णन के अनुसार, धर्म वह अनुशासन है, जो अन्तरात्मा को स्पर्श करता है और हमें बुराई एवं कुत्सिता से संघर्ष करने में सहायता देता है व काम, क्रोध, लोभ से हमारी रक्षा करता है। धर्म नैतिक बल को उन्मुक्त करता है तथा संसार को बाँधने के महान् कार्य के लिए साहस प्रदान करता है। इसने हिन्दू धर्म के केन्द्रीय सिद्धान्तों, इसके दार्शनिक और आध्यात्मिक सिद्धान्त, धार्मिक अनुभव, नैतिक चरित्र और पारम्परिक धर्मों का विश्लेषण किया है। हिन्दू धर्म परिणाम नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है। इसमें विकसित होती परम्परा है, न कि अन्य धर्मों के समान निश्चित रहस्योद्घाटन। इन्होंने ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म और बौद्ध धर्म की तुलना हिन्दू धर्म से की है तथा इस बात का विश्लेषण किया कि इन धर्मों का अन्तिम उद्देश्य सार्वभौमिक स्वयं की प्राप्ति है। सभी धर्मों में धार्मिक मतभेदों का मूल कारण धर्म के प्रत्येक पक्ष के स्थान पर किसी एक पक्ष पर सम्पूर्ण बल दिया जाना तथा अन्य पक्षों की उपेक्षा करना है। यदि सभी धर्मों के मूल में जाकर विश्लेषण किया जाए, तो यह बात स्पष्ट होती है कि सभी धर्मों में एक ऐसी मूल एकरूपता है, जो इनकी विभिन्नता से ऊपर उठकर है। यही एकरूपता सार्वभौमिक धर्म है। यहाँ पर विभिन्न धर्मों के विवाद समाप्त हो जाते हैं।

----------


राधाकृष्णन का जीवन आदर्श विचार

राधाकृष्णन का जीवन आदर्श विचार 

राधाकृष्णन का जीवन आदर्श विचार 

     राधाकृष्णन ने Idea (आदर्श) तथा Idealism (आदर्शवाद) शब्द के विभिन्न अर्थों का विश्लेषण किया है। Idea का तात्पर्य है, यह हमें किस ओर प्रेरित कर रहा है या किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अग्रसर कर रहा है। जगत् के क्रियाकलाप कोई अबौद्धिक क्रियाकलाप नहीं हैं, बल्कि यह निरन्तर किसी आदर्श प्राप्ति की ओर उन्मुख होता है, तो वह विचार आदर्शवाद का उदाहरण बन जाता है। इसी दृष्टि से आदर्शवादी विचारक जगत् की अपनी सार्थकता को स्वीकार करते हैं, जिसका अपना कुछ लक्ष्य है और इसकी सभी प्रक्रियाएँ उस लक्ष्य के प्रयोजन की प्राप्ति के माध्यम हैं। राधाकृष्णन पूर्णतया एक आदर्शवादी हैं, क्योंकि उनके अनुसार जगत् प्रक्रिया से कुछ प्रयोजन सिद्ध होते हैं और यह प्रक्रिया सतत् किसी लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रही है। वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास के कारण आधुनिक जीवन यन्त्रयुक्त जीवन हो गया है। परिणामस्वरूप मानव की आत्म-अनुभूति शक्ति कुंठित हो गई है, जिससे मानव जगत् प्रक्रिया के इस आदर्श रूप की उपेक्षा कर देता है। राधाकृष्णन के अनुसार, जगत् प्रक्रिया के आदर्श रूप स्थापित करने के लिए सबसे अधिक आवश्यकता आत्म को जगाने की है तथा आध्यात्मिक आस्था को पुनः स्थापित करने की है। जब तक मानव की आध्यात्मिक शक्ति जाग्रत नहीं होती है, तब तक मानव जीवन दिशाहीन, निरर्थक एवं अशुभ ही प्रतीत होगा।

-------------


विश्व के लोगों को चार्वाक दर्शन का ज्ञान क्यों जरूरी है ?

विश्व के लोगों को चार्वाक दर्शन का ज्ञान क्यों जरूरी है ? चार्वाक दर्शन की एक बहुत प्रसिद्ध लोकोक्ति है – “यावज्जजीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्...