Tuesday, May 17, 2022

इकबाल का आत्मा विचार

इकबाल का आत्मा विचार 

इकबाल का आत्मा विचार 

    इकबाल का आत्म विचार प्रसिद्ध सूफी उक्ति ‘अनलहक’ अर्थात मैं ही सृजनात्मक सत्य हूँ, से प्रेरित है। इकबाल आत्मा के लिए ‘Self’ शब्द का प्रयोग करते है। इकबाल Self शब्द से Ego अर्थात शरीरधारी अहं से आत्मा को भिन्न करते है। वे कहते है कि ‘आत्मा (Self) शरीर (Ego) से भिन्न कुछ है’। इसी कारण आत्मा से शरीर से भिन्न कुछ का बोध होता है। इकबाल यह स्वीकारते है कि आत्मा सभी मानवीय क्रियाओं को संगठित रखने का आन्तरिक रूप है, परन्तु वे यह नहीं मानते कि आत्मा शरीर से सर्वथा भिन्न है। उनके अनुसार आत्मा शरीरिक क्रियाओं को संगठित रखने का आधार है। इकबाल का कहना है कि अहंरूप आत्मा की वास्तविकता को समझने के लिए एक सूझ की आवश्यकता है। 

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मुहम्मद इकबाल ( Muhammad Iqbal )

मुहम्मद इकबाल ( Muhammad Iqbal ) 

मुहम्मद इकबाल ( Muhammad Iqbal ) 

    20 वीं शताब्दी की भारतीय विचारधारा में सर मुहम्मद इकबाल ने अपनी कविता के माध्यम से इस्लामिक दर्शन को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। उनके दार्शनिक चिन्तन का लक्ष्य इस्लाम के सत्यों की अर्थ-संरचना को प्रकट करना थ। 

मुहम्मद इकबाल ( Muhammad Iqbal ) के दार्शनिक विचार 

इकबाल का आत्मा विचार

इकबाल का ईश्वर विचार

इकबाल की मानव एवं अतिमानव की अवधारणा

इकबाल का बुद्धि एवं अन्तः प्रज्ञा विचार

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Monday, May 16, 2022

श्री अरविन्द का समग्र योग

श्री अरविन्द का समग्र योग 

श्री अरविन्द का समग्र योग 

    श्री अरविन्द के अनुसार, मानस से अतिमानस का विकास योग के द्वारा ही सम्भव है। मानस से अतिमानस तक पहुँचने का उद्योग ही पूर्ण योग या समग्र योग कहलाता है। विकास की इस प्रक्रिया को सम्पन्न करने हेतु त्रिस्तरीय विधि या त्रिस्तरीय रूपांतरणों का प्रयोग किया जाता है – चैत्य रूपांतरण (आत्मिकता की प्रक्रिया), आध्यात्मिक रूपांतरण (आध्यात्मिकता की प्रक्रिया) तथा अतिमानसिक रूपांतरण (अतिमानसिक प्रक्रिया)। श्री अरविन्द के अनुसार, ये तीनों प्रक्रिया आन्तरिक है जिससे केवल आन्तरिक विकास है। अतः श्री अरविन्द का पूर्ण योग ‘आन्तरिक योग’ भी कहलाता है। श्री अरविन्द के अनुसार, मनुष्य का मानस से अतिमानस बन जाना ही पृथ्वी पर दिव्य जीवन को स्थापित करने का सोपान है। दिव्य जीवन वही होगा जहाँ सभी मानव ज्ञान पुरुष होंगें।

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श्री अरविन्द का मन एवं अतिमनस विचार

श्री अरविन्द का मन एवं अतिमनस विचार 

 श्री अरविन्द का मन एवं अतिमनस विचार 

    श्री अरविन्द के अनुसार, विकास की प्रक्रिया जड़ तत्त्व (Matter), प्राण तत्त्व (Life) तथा मन (Psyche) से होती हुई मानस (Mind) के स्तर तक पहुँचती है। यह मानस अपने आप में पहले तीन स्तरों को समेटे हुए है। इसके बाद मानस से अतिमानस तक का विकास होता है। मानस से अतिमानस तक पहुँचने का क्रमिक विकास स्तर – उच्चतर मानस, प्रदीप्त मानस, अन्तर्दृष्टि तथा व्यापक दृष्टि है।

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श्री अरविन्द का विकास विचार

 

श्री अरविन्द का विकास विचार 

श्री अरविन्द का विकास विचार 

    श्री अरविन्द के अनुसार जगत के विकास की प्रक्रिया द्विरूपात्मक है। ये रूप है - अवतरण और विकास। परमतत्त्व की जगत के रूप में अभिव्यक्ति अवतरण है तथा विश्व के विभिन्न स्तरों का निम्न स्तरों से उच्च स्तरों में विकसित होना विकास है और यह विकास तभी सम्भव हो पाता है जब परमतत्त्व का पहले निम्न स्तरों में अवतरण हो। इस विकास में तीन प्रक्रियाएँ समाहित है – विस्तार, ऊर्ध्वीकरण तथा एकीकरण या समग्रीकरण। समग्रीकरण का अर्थ है – निम्नतर रूपों को उच्चतर रूपों में समन्वित करना। यही कारण है कि श्री अरविन्द के विकास सिद्धान्त को ‘विकास का समग्रतावादी सिद्धान्त’ कहा जाता है।  

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श्री अरविन्द घोष ( Sri Aurobindo )

 

श्री अरविन्द घोष ( Sri Aurobindo ) 

श्री अरविन्द घोष ( Sri Aurobindo ) 

    अरविन्द घोष या श्री अरविन्द जन्म- 1872, मृत्यु- 1950) एक योगी एवं दार्शनिक थे। वे 15 अगस्त 1972 को कलकत्ता में जन्मे थे। इनके पिता एक डाक्टर थे। इन्होंने युवा अवस्था में स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारी के रूप में भाग लिया, किन्तु बाद में यह एक योगी बन गये और इन्होंने पांडिचेरी में एक आश्रम स्थापित किया। वेद, उपनिषद ग्रन्थों आदि पर टीका लिखी। योग साधना पर मौलिक ग्रन्थ लिखे। उनका पूरे विश्व में दर्शन शास्त्र पर बहुत प्रभाव रहा है और उनकी साधना पद्धति के अनुयायी सब देशों में पाये जाते हैं। यह कवि भी थे और गुरु भी।

   अरविन्द का दर्शन पूर्ण अद्वैतवाद कहलाता है क्योंकि यहाँ जड़ तथा चेतन के द्वैत को स्वीकार नहीं किया गया है बल्कि जड़ तथा चेतन की अंतर्निहित एकता पर बल दिया गया है। अरविन्द का मत है कि परमतत्त्व में जड़ एवं चेतन दोनों पक्षों का अनुपम समन्वय विद्यमान है।

श्री अरविन्द घोष ( Sri Aurobindo ) की कृतियाँ

Ø  द मदर

Ø  लेटर्स ऑन योगा

Ø  सावित्री

Ø  योग समन्वय

Ø  दिव्य जीवन

Ø  फ्यूचर पोयट्री

Ø  योगिक साधन

Ø  "वंदे मातरम"

Ø  कारा काहिनी (जेलकथा)

Ø  धर्म ओ जातीयता (धर्म और राष्ट्रीयता)

Ø  अरबिन्देर पत्र (अरविन्द के पत्र)

मुख्य ग्रन्थ हिंदी में

Ø  दिव्य जीवन (लाइफ डिवाइन)

Ø  सावित्री (पद्यानुवाद)

Ø  योग-समन्वय

Ø  श्रीअरविन्द अपने विषय में

Ø  माता

Ø  भारतीय संस्कृति के आधार (फाउण्डेशन ऑफ इंडियन कल्चर)

Ø  वेद-रहस्य

Ø  केन एवं अन्यान्य उपनिषद्

Ø  ईशोपनिषद

Ø  गीता-प्रबंध

सम्पूर्ण संस्करण

श्री अरविन्द की 125 वीं जयन्ती के अवसर पर, 1997 में श्री अरबिंदो आश्रम ने श्री अरविन्द की सम्पूर्ण कृतियों को 37 भागों में प्रकाशित किया। ये भाग निम्नलिखित हैं-

1. Early Cultural Writings.

2. Collected Poems.

3.-4. Collected Plays and Stories.

5. Translations.

6.-7. Bande Mataram.

8. Karmayogin.

9. Writings in Bengali and Sanskrit.

10.-11. Record of Yoga.

12. Essays Divine and Human.

13. Essays in Philosophy and Yoga.

14. Vedic and Philological Studies.

15. The Secret of the Veda.

16. Hymns to the Mystic Fire.

17. Isha Upanishad.

18. Kena and Other Upanishads.

19. Essays on the Gita.

20. The Renaissance of India with a Defence of Indian Culture.

21.-22. The Life Divine.

23.-24. The Synthesis of Yoga.

25. The Human Cycle – The Ideal of Human Unity – War and Self-Determination.

26. The Future Poetry.

27. Letters on Poetry and Art

28.-31. Letters on Yoga.

32. The Mother with Letters on the Mother.

33-34. Savitri – A Legend and a Symbol.

35. Letters on Himself and the Ashram.

36. Autobiographical Notes and Other Writings of Historical Interest.

37. Reference Volume (unpublished)


श्री अरविन्द घोष ( Sri Aurobindo ) का दर्शन 



Saturday, May 14, 2022

विवेकानन्द के धार्मिक अनुष्ठान

      स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, धर्मों का बाहरी अनुष्ठान आध्यात्मिक महत्त्व का होता है। धर्मों के आध्यात्मिक सार को स्वीकार करने की आवश्यकता है। हम मानव जाति को ऐसे स्थान पर ले जाना चाहते हैं, जहाँ न तो वेद, न ही बाइबिल और न ही कुरान है। यह वेदों, बाइबिल एवं कुरान के सामंजस्य से किया जा सकता है। मानव जाति को यह शिक्षा देनी चाहिए कि धर्म विभिन्न प्रकार के विचारों की अभिव्यक्ति है, जिसकी समष्टि में प्रत्येक मानव अपने पथ का चुनाव कर सकता है, जो उसके लिए सबसे उपयुक्त हो। कई दृष्टिकोण से सत्य को देखा जा सकता है और विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। इस आधारभूत सत्य को स्वीकार करना चाहिए। मनुष्य की निःस्वार्थ सेवा सर्वव्यापी रूप में प्रदर्शित होती है। इसके लिए आत्मनियन्त्रण वांछनीय है। मोक्ष सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है, जो स्वयं उसमें समाहित है।

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विश्व के लोगों को चार्वाक दर्शन का ज्ञान क्यों जरूरी है ?

विश्व के लोगों को चार्वाक दर्शन का ज्ञान क्यों जरूरी है ? चार्वाक दर्शन की एक बहुत प्रसिद्ध लोकोक्ति है – “यावज्जजीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्...